शिव हैं इस दुनिया के सबसे बड़े शिक्षक : पूजा करते हैं तो कुछ सीखें भी

देवों के देव हैं महादेव

भगवान शिव को देवों के देव कहते हैं।

इन्हें महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है।

ब्रह्मा और विष्णु के त्रिवर्ग में उनकी गणना होती है।

पूजा, उपासना में शिव और उनकी शक्ति की ही प्रमुखता है।

उन्हें सरलता की मूर्ति माना जाता है।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नाम से उनके विशालकाय तीर्थ स्वरूप देवालय भी हैं।

अनादि हैं शिव

भारतीय धर्म के प्रमुख देवता हैं।

दुनिया के हर कोने किसी न किसी रूप से शिव की पूजा होती रही है।

सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता हो

या रोमन साम्राज्य की सभ्यता।

शिव अलग-अलग रूपों में और अलग-अलग नामों से हर जगह पूजे जाते रहे हैं।

शायद इसीलिए शिव को अनादि देव भी कहते हैं

अर्थात जिसका कोई शुरुआत नहीं ।

जबसे से यह दुनिया है तब से हैं वे

 

बहुत आसान है शिव की पूजा

 

 

शिव की पूजा करना बहुत ही आसान है ।

कहीं भी साफ-सुथरी जगह पर पवित्र मन से एक गोल पत्थर की स्थापना से शिव की प्रतिमा स्थापित हो जाती है।

मात्र एक लोटा जल चढ़ा देने से ही उनकी पूजा हो जाती है।

संभव हो तो बेलपत्र भी चढ़ाए जा सकते है।

उनकी पूजा में फलों की कोई आवश्यकता नहीं होती है और न ही  धूप दीप, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प जैसे उपचार अलंकारों के प्रति उनका आकर्षण है।

‘कल्पना’ ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है’

शिव ने ही कहा है कि ‘कल्पना’ ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है, हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं।

शिव ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया।

परिवर्तन ही शिव है

इस सृष्टि के प्राणी और सभी पदार्थ तीन स्थितियों में होकर गुजरते हैं-एक उत्पादन, दूसरा अभिवर्द्धन और तीसरा परिवर्तन है।

सृष्टि की उत्पादक प्रक्रिया को ब्रह्मा, अभिवर्द्धन को विष्णु और परिवर्तन को शिव कहते हैं।

निष्क्रियता शिव को पसंद नहीं

मृत्यु, जीवन का आधार है।

बिना मृत्यु के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।

मरण के साथ जन्म का यहाँ अनवरत क्रम है।

बीज गलता है तो नया पौधा पैदा होता है।

गोबर सड़ता है तो उसका खाद पौधों की बढ़ोत्तरी में असाधारण रूप से सहायक होता है।

पुराना कपड़ा छोटा पड़ने या फटने पर उसे गलाया और कागज बनाया जाता है।

नए वस्त्र की तत्काल व्यवस्था होती है।

इसी उपक्रम को शिव कहा जा सकता है।

वह शरीर के अनगिनत जीव कोशिकाओं के मरते-जन्मते रहने से भी देखा जाता है और सृष्टि के जरा-जीर्ण होने पर महाप्रलय के रूप में भी।

 

शिव को निष्क्रियता पसंद नहीं

गतिशीलता ही उन्हें अभीष्ट है।

गति के साथ परिवर्तन अनिवार्य है।

स्थिरता तो जड़ता है।

सृष्टि की अनवरत परिवर्तन प्रक्रिया में शिव की अनुभूति की जा सकती है।

हर कल्पना में शिव हैं

भारतीय विद्वान, तत्वज्ञानी और कलाकार ,  कल्पना भाव-संवेदना के धनी भी रहे हैं।

उन्होंने प्रवृत्तियों को मानुषी काया का स्वरूप दिया है।

विद्या को सरस्वती, संपदा को लक्ष्मी एवं पराक्रम को दुर्गा का रूप दिया है।

इसी प्रकार अनेकानेक तत्त्व और तथ्य देवी-देवताओं के नाम से  इस प्रकृति की महिमा को स्थापित किया गया है।

परब्रह्म मात्र एक ही है

तत्त्वज्ञानियों के अनुसार देवता एक से अनेक बने हैं।

समुह का जल एक होते हुए भी उसकी लहरें ऊँची-नीची भी दीखती हैं और विभिन्न आकार-प्रकार की भी।

परब्रह्म एक है तो भी उसके अंग-अवयवों को तरह देववर्ग की मान्यता आवश्यक जान पड़ी।

इसी आलंकारिक संरचना में शिव को की मूर्द्धन्य स्थान मिला।

वे प्रकृतिक्रम के साथ गुँथकर पतझड़ के पीले पत्तों को गिराते तथा बसंत के पल्लव और फूल खिलाते रहते हैं।

शिव हैं श्मशान वासी

शिव को श्मशानवासी कहा जाता है।

मरण भयावह नहीं है और न उसमें अशुचिता है।

गंदगी तो सड़न से फैलती है।

काया की विधिवत् अंत्येष्टि कर दी गई तो सड़न का प्रश्न ही नहीं रहा।

हर व्यक्ति को मरण के रूप में शिवसत्ता का ज्ञान बना रहे।

इसलिए उन्होंने अपना डेरा श्मशान में डाला है।

वहीं बिखरी भस्म को शरीर पर मल लेते हैं, ताकि ऋतु प्रभावों का असर न पड़े।

मृत्यु को जो भी जीवन के साथ गुँथा हुआ देखता है उसे न तो अहंकार छूती  और न डर का एहसास होता है ।

वह निर्विकल्प निर्भय बना रहता है।

पौरुष का द्योतक है बाघ चर्म

वे बाघ का चर्म धारण करते है।

जीवन में ऐसे ही साहस और पौरुष की आवश्यकता है जिसमें बाघ जैसे अनर्थों और अनिष्टों की चमड़ी उधेड़ी जा सके और उसे कमर से कसकर बाँधा जा सके।

विष पीकर दुनिया को दिया एक बड़ा संदेश

शिव की नीलकंठ भी कहते हैं।

कथा है कि समुद्र मंथन में  अमृत के साथ दर्प का विष निकला था ।

अमृत पीने के लिए तो सभी लालायित थे पर विष कोई भी पीना नहीं चाहता था।

तो शिव ने उस हलाहल  को मुंह में डालकर गले में ही रोक लिया।

लेकिन  उसे पिया नहीं उसे अपने गले में धारण कर लिया न उगला और न पीया।

उगलते तो वातावरण में विषाक्तता फैलती।

पीने पर पेट में कोलाहल मचता।

मध्यवर्ती नीति यही अपनाई गई।

शिक्षा यह है कि विषाक्तता को न तो आत्मसात् करें, न ही विक्षोभ उत्पन्न कर उसे उगलें।

उसे कंठ तक ही प्रतिबंधित रखे।

सबसे बड़े योगी हैं शिव

 

पूरे परिवार के साथ रहते हैं फिर भी सन्यासी हैं।

 

गृहस्थ होकर भी पूर्ण योगी होना शिव जी के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटना है।

सांसारिक व्यवस्था को चलाते हुए भी वे योगी रहते हैं, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।

वे अपनी धर्मपत्नी को भी मातृ-शक्ति के रूप में देखते हैं।

यह उनकी महानता का दूसरा आदर्श है।

ऋद्धि-सिद्धियाँ उनके पास रहने में गर्व अनुभव करती हैं।

यहाँ उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्मकल्याण की साधना असंभव नहीं।

जीवन में पवित्रता रखकर उसे हँसते-खेलते पूरा किया जा सकता है।

योगी पुरुष अपने सूक्ष्मशरीर पर अधिकार पा लेते हैं जिससे उनके स्थूलशरीर पर तीक्ष्ण विषों का भी प्रभाव नहीं होता।

उन्हें भी वह सामान्य मानकर पचा लेता है।

इसका अर्थ यह भी है कि संसार में अपमान,कटुता आदि दुःख-कष्टों का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता।

उन्हें भी वह साधारण घटनाएँ मानकर आत्मसात् कर लेता है और विश्व कल्याण की अपनी आत्मिक वृत्ति निश्चल भाव से बनाए रहता है।

दूसरे व्यक्तियों की तरह लोकोपचार करते समय इसका कोई ध्यान नहीं होता। वह निर्विकार भाव से सबकी भलाई में जुटा रहता है।

खुद विष पीता है पर औरों के लिए अमृत लुटाता रहता है।

यही श्रेष्ठ योगी के लक्षण हैं।

 

सौम्यता , शक्ति और मेहनत का मेल है वृष वाहन

 

 

नंदी बाबा

 

 

शंकर भगवान की सवारी क्या है? बैल।

वह बैल पर सवार होते हैं।

बैल उसे कहते हैं जो मेहनतकश होता है, परिश्रमी होता है।

जिस आदमी को मेहनत करनी आती है, वह चाहे भारत में हो, इंग्लैण्ड, फ्रांस या कहीं का भी रहने वाला क्यों न हो-वह भगवान की सवारी बन सकता है।

भगवान सिर्फ उनकी सहायता किया करते हैं जो अपनी सहायता आप करते हैं।

बैल हमारे यहाँ शक्ति का प्रतीक है, हिम्मत का प्रतीक है।

आपको हिम्मत से काम लेना पड़ेगा और अपनी मेहनत तथा पसीने के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा।

अपनी अकल के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा।

आपके उन्नति के द्वार और कोई नहीं खोल सकता, स्वयं खोलना होगा।

 

बैल हमेशा से शंकर जी का बड़ा प्यारा रहा है।

वह उस पर सवार रहे हैं, उसको पुचकारते हैं, खिलाते, पिलाते, नहलाते, धुलाते और अच्छा रखते हैं।

हमको और आपको बैल के समान मेहनत करना चाहिए

यही शिव  शिक्षा है।

 

सबको साथ रखते हैं शिव

 

राम भी उसका रावण भी उसका

शिव का परिवार भूत-पलीत जैसे अनगढ़ों का परिवार है।

पिछड़ों, अपंगों, विक्षिप्तों को हमेशा साथ लेकर चलने से ही सेवा-सहयोग का प्रयोजन बनता है।

शंकर जी का विवाह हुआ तो सबने देवताओं को ही बारात मेन बुलाना चाहा ।

लेकिन उन्होने कहा कि  हमारी बरात में तो भूत-प्रेत ही चलेंगे।

रामायण का छंद है-”तनु क्षीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन तनु धरे।”

शंकर जी ने भूत-प्रेतों का, पिछड़ों का भी ध्यान रखा है और अपनी बरात में ले गए।

कहने का तात्पर्य यह है कि शिव ने उसे भी अपने साथ लिए जो बाकी सब के लिए त्याज्य थे।

हमें और आपको भी समाज के हर वर्ग को अपने साथ लेकर चलना है।

शंकर जी के भक्तों! अगर आप इन्हें साथ लेकर चल नहीं सकते तो फिर आपको सोचने में मुश्किल पड़ेगी,

समस्याओं का सामना करना पड़ेगा और फिर जिस आनंद में और खुशहाली में शंकर के भक्त रहते हैं आप रह नहीं पाएँगे।

जिन शंकर जी के चरणों में आप बैठे हुए हैं उनसे क्या कुछ सीखेंगे नहीं?

पूजा ही करते रहेंगे जाएँगे आप।

यह सब चीजें सीखने के लिए ही हैं।

शिव को कोई खास पूजा की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है ।

धर्म और संप्रदाय का तो कोई प्रश्न ही नहीं है

शिव के शरण में राम और रावण दोनों गए।

उनकी शरण में ज्ञानी भी जाते हैं और अज्ञानी भी।

शिव हैं ही बड़े निराले

सबको अपनी शरण में लेते हैं।

यश अपयश और लाभ-हानि तो कर्म फल हैं।

जबकि शिव तो सभी कर्मों से ऊपर हैं।

आज यह दुनिया धर्म और संप्रदाय में बंटी है जबकि नरमुंड धारण करने वाले पशुपतिनाथ तो पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं।

उनके लिए तो सभी धर्म- संप्रदाय , मनुष्य- प्रेत, देवता-दानव नर-नारी सब एक समान हैं।

विश्व स्वरूप हैं शिव

 

shivalingam

 

 

भगवान शंकर का रूप गोल बना हुआ है।

गोल क्या है-ग्लोब।

यह सारा विश्व ही तो भगवान है।

शंकर की गोल पिंडी उसी का छोटा सा स्वरूप है जो बताता है कि

यह विश्व-ब्रह्माण्ड गोल है,

एटम गोल है,

धरती माता,

विश्व माता

सब गोल है।

इसको हम भगवान का स्वरूप मानें और विश्व के साथ वह व्यवहार करें जो हम अपने लिए चाहते हैं तो दुनिया सुखी हो जाएगी ।

गीता में भी यही लिखा है

अगर विश्व को इस रूप में माने तो हम उस अध्यात्म के मूल में चले जाएँगे जो भगवान राम और कृष्ण ने अपने भक्तों को दिखाया था।

गीता के अनुसार जब अर्जुन मोह में डूबा हुआ था, तब भगवान ने अपना विराट रूप दिखाया और कहा,

“यह सारा विश्व-ब्रह्माण्ड जो कुछ भी है मेरा ही रूप है।”

एक दिन यशोदा कृष्ण को धमका रही थीं कि तूने मिट्टी खाई है।

वे बोले-नहीं मैंने मिट्टी नहीं खाई और उन्होंने मुँह खोलकर सारा विश्व ब्रह्माण्ड दिखाया दिया ।

स्त्री-पुरुष की समानता का प्रतीक  है शिव लिंग

शिव का आकार लिंग स्वरूप माना जाता है।

उसका अर्थ यह है कि सृष्टि साकार होते हुए भी उसका आधार आत्मा है।

ज्ञान की दृष्टि से उसके भौतिक सौंदर्य का कोई बड़ा महत्त्व नहीं है।

मनुष्य को आत्मा को उपासना करनी चाहिए, उसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।

सांसारिक रूप, सौंदर्य और विविधता में घसीटकर उस मौलिक सौंदर्य को तिरोहित नहीं करना चाहिए।

शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है।

साथ ही पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी।

अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि दोनों सामान है |

सबकी जरूरत है

शंकर भगवान के गले में पड़े हुए है काले साँप और मुंडों की माला।

यह बताता है कि काले विषधर सर्प का भी सही तरीके से इस्तेमाल किया जाये तो वह भी फायदेमंद हो सकता है।

समानता का द्योतक है मुंडों की माला

 

shiva

 

शिव जब उल्लास विभोर होते हैं तो मुंडों की माला गले में धारण करते हैं।

यह जीवन की अंतिम परिणति और सौगात है जिसे राजा व रंक समानता से छोड़ते हैं।

न प्रबुद्ध ऊँचा रहता है और न अनपढ़ नीचा।

सभी एकसूत्र में पिरो दिए जाते हैं।

यही समत्व रोग है, विषमता यहाँ नहीं फटकती।

सृष्टि को बचाने के लिए विष पिया और  नीलकंठ कहलाए

शंकर जी के गले में पड़ी मुंडों की माला भी यह कह रहीं है कि जिस चेहरे को हम बीस बार शीशे में देखते हैं,

सजाने-सँवारने के लिए रंग पाउडर पोतते हैं, वह मुंडों की हड्डियों का टुकड़ा मात्र है।

चमड़ी जिसे ऊपर से सुनहरी चीजों से रँग दिया गया है और जिस बाहरी रंग के टुकड़ों को हम देखते हैं,

उसे उघाड़कर देखें तो मिलेगा कि इनसान की जो खूबसूरती है उसके पीछे सिर्फ हड्डी का टुकड़ा जमा हुआ पड़ा है।

हड्डियों की मुण्डमाला जीवन कि सबसे बड़ी शिक्षा है

जो हमको शंकर भगवान के चरणों में बैठकर सीखनी चाहिए।

शांति और शीतलता का प्रतीक है चंद्रमा

शिवजी का मस्तक ऐसी विभूतियों से सुसज्जित है जिन्हें हर दृष्टि से उत्कृष्ट एवं आदर्श कहा जा सकता है।

शिव के मस्तक पर चन्द्रमा है, जिसका अर्थ है-शांति,संतुलन।

चंद्रमा मन की शांत अवस्था का प्रतीक है अर्थात योगी का मन सदैव चंद्रमा की भाँति प्रफुल्ल और उसी के समान खिला निःशंक होता है।

चन्द्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक भी है अर्थात उसे जीवन की अनेक गहन परिस्थितियों में रहते हुए भी किसी प्रकार का विभ्रम अथवा ऊहापोह नहीं होता।

वह प्रत्येक अवस्था में शांत रहता है, विषमताओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

सिर से गंगा की जलधारा बहने से आशय ज्ञानगंगा से है

मस्तिष्क के अंतराल में मात्र ‘ग्रे मैटर’ न भरा रहे,ज्ञान-विज्ञान का भंडार भी भरा रहना चाहिए, ताकि अपनी समस्याओं का समाधान हो एवं दूसरों को भी उलझन से उबारें।

वातावरण को सुख-शांतिमय कर दें।

सिर से गंगा का उद्भव शिवजी की आध्यात्मिक शक्तियों पर उनके जीवन के आदर्शों पर प्रकाश डालती है।

गंगा जी विष्णुलोक से आती हैं। यह अवतरण महान आध्यात्मिक शक्ति के रूप में होता है।

उसे संभालने का प्रश्न बड़ा विकट था।

शिवजी को इसके उपयुक्त समझा गया और भगवती गंगा को उनकी जटाओं में आश्रय मिला।

गंगा जी यहाँ ‘ज्ञान की प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति के रूप में अवतरित होती हैं।

लोक-कल्याण के लिए उन्हें धरती पर उतार लेने की यह प्रक्रिया इस करण होती बताई गई है ताकि अज्ञान से भरे लोगों को जीवनदान मिल सके,

पर उस ज्ञान को धारण करना भी तो कठिन बात थी जिसे शिव जैसा संकल्प शक्ति वाला महापुरुष ही धारण कर सकता है।

अर्थात महान बौद्धिक क्रांतियों का सृजन भी कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जिसके जीवन में भगवान शिव के आदर्श समाए हुए हों।

वही ब्रह्मज्ञान को धारण कर उसे लोक हितार्थ प्रवाहित कर सकता है।

ज्ञान चक्षु है तीसरा नेत्र

शिव के तीन नेत्र हैं।

तीसरा नेत्र ज्ञानचक्षु है, दूरदर्शी विवेकशील का प्रतीक जिसकी पलकें उघड़ते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया।

सद्भाव के भगीरथ के साथ ही यह तृतीय नेत्र का दुर्वासा भी विद्यमान है।

और अपना ऋषित्व स्थिर रखते हुए भी दुष्टता को उन्मुक्त नहीं विचरने देता ।

उसका विनाश करके ही रहता है।

हर मनुष्य के पास है  तृतीय नेत्र

वस्तुतः यह तृतीय नेत्र स्रष्टा ने प्रत्येक मनुष्य को दिया है।

सामान्य परिस्थितियों में वह विवेक के रूप में जाग्रत रहता है

पर वह अपने आप में इतना सशक्त और पूर्ण होता है कि काम वासना जैसे गहन प्रकोप भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

उन्हें भी जला डालने की क्षमता उसके विवेक में बनी रहती है।

यदि यह तीसरा नेत्र खुल जाए तो सामान्य मनुष्य भी एक बीज से विशाल वटवृक्ष बन कर असंख्य गुना लाभ प्राप्त कर सकता है।

तृतीय नेत्र  का तात्पर्य है- अपने आप को साधारण क्षमता से उठाकर विशिष्ट श्रेणी में पहुँचा देना।

तीन गुणों को दर्शाते हैं त्रिशूल

माना जाता है क‌ि सृष्ट‌ि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब श‌िव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए।

यही तीनों गुण श‌िव जी के तीन शूल यानी त्र‌िशूल बने।

इनके बीच सांमजस्य बनाए बगैर सृष्ट‌ि का संचालन कठ‌िन था।

इसल‌िए श‌िव ने त्र‌िशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण क‌िया।

ब्रह्म स्वरूप है डमरू

शिव डमरू बजाते और मौज आने पर नृत्य भी करते हैं।

यह प्रलयंकर की मस्ती का प्रतीक है।

व्यक्ति उदास, निराश और खिन्न, विपन्न बैठकर अपनी उपलब्ध शक्तियों को न खोए, पुलकित-प्रफुल्लित जीवन जिए।

शिव यही करते हैं, इसी नीति को अपनाते हैं।

उनका डमरू ज्ञान, कला, साहित्य और विजय का प्रतीक है।

यह पुकार-पुकारकर कहता है कि शिव कल्याण के देवता हैं।

उनके विचारों रूपी खेत में कल्याणकारी योजनाओं के अतिरिक्त और किसी वस्तु की उपज नहीं होती।

विचारों में कल्याण की समुद्री लहरें हिलोरें लेती हैं।

उनके हर शब्द में सत्यम्, शिवम् की ही ध्वनि निकलती है।

डमरू से निकलने वाली सात्त्विकता की ध्वनि सभी को मंत्रमुग्ध सा कर देती है और जो भी उनके समीप आता है अपना सा बना लेती है।

डमरू ब्रह्म का स्वरूप है।

जो दूर से व‌िस्‍तृत नजर आता है लेक‌िन जैसे-जैसे ब्रह्म के करीब पहुंचते हैं वह संकु‌च‌ित हो दूसरे स‌िरे से म‌िल जाता है और फ‌िर व‌िशालता की ओर बढ़ता है।

सृष्ट‌ि में संतुलन के ल‌िए इसे भी भगवान श‌िव अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे।

शिव का आहार भंग है भांग नहीं

शिव के प्रिय आहार में एक सम्मिलित है-भांग, भंग अर्थात विच्छेद-विनाश।

माया और जीव की एकता का भंग, अज्ञान आवरण का भंग, संकीर्ण स्वार्थपरता का भंग, कषाय-कल्मषों का भंग।

यही है शिव का रुचिकर आहार।

जहाँ शिव की कृपा होगी वहाँ अंधकार की निशा भंग हो रही होगी और कल्याणकारक अरुणोदय वह पुण्य दर्शन मिल रहा होगा।

पशुता का निराकरन करते हैं पशुपतिनाथ

शिव को पशुपति कहा गया है।

पशुत्व की परिधि में आने वाली दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का नियन्त्रण करना पशुपति का काम है।

नर-पशु के रूप में रह रहा जीव जब कल्याणकर्त्ता शिव की शरण में आता है तो सहज ही पशुता का निराकरण हो जाता है और क्रमश: मनुष्यत्व और देवत्व विकसित होने लगता है।

त्रिवर्ग दानी हैं शिव

महामृत्युञ्जय मंत्र में शिव को त्र्यंबक और सुगंधि पुष्टि वर्धनम् गया है।

विवेक दान को त्रिवर्ग कहते हैं।

ज्ञान, कर्म और भक्ति भी त्र्यंबक है।

इस त्रिवर्ग को अपनाकर मनुष्य का व्यक्तित्व प्रत्येक दृष्टि से परिपुष्ट व परिपक्व होता है।

उसकी समर्थता और संपन्नता बढ़ती है।

साथ ही श्रद्धा, सम्मान भरा सहयोग उपलब्ध करने वाली यशस्वी उपलब्धियाँ भी करतलगत होती हैं।

यही सुगंध है।

गुण कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता का प्रतिफल यश और बल के रूप में प्राप्त होता है।

इसी रहस्य का उद्घाटन महामृत्युञ्जय मंत्र में विस्तारपूर्वक किया गया है।

शिव हैं इस दुनिया के सबसे बड़े शिक्षक

 

सन्यासी शिव

 

शिव की पूरी जीवनशैली मनुष्य को शिक्षा देती है।

  • गृहस्थ रहते हुये भी योगी बने रहने का ।
  • जीवन कड़वे अनुभवों को आत्मसात कर लेने का ।
  • अमीर-गरीब , पिछड़े सबको साथ लेकर चलने का।
  • जीवन बैल के समान मेहनत करने का ।
  •  जब विपत्ति आए तो उसका त्रिशूल से सामना करना अर्थात रजो गुण – तमो गुण और सत गुण मेन समंजस्य बैठा कर चलना ।
  •  तीसरे नेत्र से हर बाधा से टकरा जाने का।
  • सिर पर हमेशा चाँद जैसी शीतलता कायम रखने का।
  • भीतर हमेशा ज्ञान रूपी गंगा अविरल प्रवाहित होती रहे ।
  • बुराइयों को भंग करने का ।

शिव का पूरा जीवन इस संसार को समर्पित है।

हमें उनकी पूजा के साथ- साथ उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए ।

Last updated: सितम्बर 1st, 2017 by Pankaj Chandravancee

Pankaj Chandravancee
Chief Editor (Monday Morning)
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