यदि आप भी हैं ‘ सेल्फी ‘ के शौकीन तो इसे पढ़ें

शेल्फी से मौत तक का सफर

सेल्फी से “सेल्फ डेथ” तक का सफ़र

सेल्फी यानि खुद की तस्वीर खुद ही लेना, लेकिन हाल के खबरों पर ध्यान दे तो सेल्फी का मायने ही बदल गया है.
आज यह पागलपन के हद पार कर चूका है.
खासकर युवा पीढ़ी सेल्फी की ओर कुछ ज्यादा ही आकर्षित है और उनका दीवानापन में वृद्धि होती दिख रही है.

सेल्फी के दीवाने भारत में भी बहुतायत पाये जाते है

आक्सफोर्ड वालो ने वर्ष 2013 में इसपर अपना ठप्पा लगाया और तब से यह मनोरोग की तरह भारत में भी फ़ैलने लगा.
आज लोग सेल्फी लेने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाल दे रहे हैं।
ऊँची पहाड़ी हो या खतरनाक वादी या खूंखार जानवर हो सभी के साथ सेल्फी लेने के आतुर है लोग.

बढ़ गया है सेल्फी शब्द का उपयोग

आजकल सोशल मिडिया हो या आम बोलचाल की भाषा में सेल्फी का उपयोग अत्यधिक होने लगा है.
स्मार्टफोन और आईफोन के इस दौर में हर कोई सेल्फी के आकर्षण से बंधता जा रहा है.
यानी हम डिजिटल गुलाम बनते जा रहे हैं और यह नयी संस्कृति हमारे पुरानी संस्कृति पर हावी हो गए है.
जिसके चलते हम अपनों से दूर होने के साथ ही तन्हाई में रहने के आदि होते जा रहे है.

मशहूर हस्तियों में भी हैं सेल्फी की दीवानगी

सेल्फी की दीवानगी केवल आम लोगों में ही नहीं बल्कि मशहूर हस्तियों में भी इसकी चाहत देखी जाती है.
सेल्फी का ट्रेंड सेलेब्रिटी पर भी सर चढ़ कर बोलता है.
हिंदी फिल्मो की नायिका हो या नायक सभी अनोखी सेल्फी सोशल मिडिया पर पोस्ट करने को आतुर रहते हैं।
इनके फैंस को भी अपने स्टार की सेल्फी का बेसब्री से इन्तेजार रहता है.
और वे अक्सर अपनी सेल्फी तस्वीर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर करते रहते हैं.

सेल्फी जो स्मार्ट मोबाईल से शुरू हुआ था और अब कल्चर बन गया

मजे की बात है कि सेल्फी का भी नामकरण होने लगा है.
इसमें शामिल है टी-रेक्स. इस सेल्फी पोज़ के बारे में कहा जाता है कि डायनासौर फैमिली का मेंबर टाईरानासोरस रेक्स था.
जिसके नाखून काफी बड़े होते थे जिसे मीट खाने वाला सबसे बड़ा जानवर के रूप में जाना जाता था.
आज हिंदी फिल्मो की नायिका अपने नाखुनो को बड़ी करके सेल्फी लेती है.

सेल्फी का जूनून कई लोगो को मौत की नींद भी सुला चूका है

सेल्फी का जूनून कई लोगो को मौत की नींद भी सुला चूका है और समय के साथ  सेल्फी शब्द ‘सेल्फी डेथ’ में तब्दील हो गया.
हाल की घटनाक्रम पर नजर डाले तो विगत दिनों 27 जून 2017 को चुनाभट्टी की रहने वाली प्रीति पीसे मुंबई के मशहूर मरीन ड्राइव पर अपने दोस्तों के साथ घूमने गई थी और सेल्फी लेने के दौरान समुद्र में डूबने से उसकी मौत हो गयी.

दुनिया में सेल्फी से सबसे ज्यादा मौतें भारत में हुयी

गौरतलब है कि कार्नेड मेलन यूनिवर्सिटी और इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ दिल्ली के शोधकर्ताओं ने अपने प्रकाशित रिपोर्ट ‘मी मायसेल्फ और माईकिल्फी’ में ये कहा गया है कि पूरी दुनिया में मार्च 2014 से सितंबर 2016 के बीच सेल्फी से सबसे अधिक मौते भारत में हुई है.

रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान सेल्फी के चक्कर में 127 लोगो की मौत हुयी, जिसमें 72 मौतें भारत में हुई हैं.
वही 9 मई 2016 को एसएनडीटी कॉलेज की 18 वर्षीय छात्रा तरन्नुम अंसारी बांद्रा में समुद्र किनारे अपने दोस्तों के साथ सेल्फी लेने के दौरान मौत हो गई थी.जिसे बचाने के लिए उसका मित्र रमेश वालुंज समुद्र में कूद गया और उसकी भी जान चली गई.

15 मई 2017 को तमिलनाडु की 21 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्रा मीनाक्षी राजेश की रॉकी पैच के किनारे अपनी बहन और मां के साथ सेल्फी लेने के दौरान एक लहर की चपेट में आकर मौत हो गई.
ऐसी कई घटनाएं भरी पड़ी है, जिसमे सेल्फी,’डेथ सेल्फी’ बन गया.

खुद को सबसे अलग दिखाना है सेल्फी डेथ का कारण है

सोशल साइट्स पर खुद की तस्वीर विरले साबित हो सके यही चेतना आज के युवाओ में बनी रहती है.
जब वे कही घुमाने जाते है तो उनका स्मार्ट मोबाइल सेल्फी से भरी रहती है.
सेल्फी की दीवानगी युवाओ से अधिक युवतियों में देखि जा रही है.

एक मनोरोग बन चुका है सेल्फी

वैसे सेल्फी लेना एक शौक ही माना जायेगा लेकिन आजकल जिस तरह कि दीवानगी व जूनून देखा जा रहा है,
तो इसे मनोरोग कहना भी गलत नहीं होगा.

स्मार्टफोन फोन के बाजार में आने के बाद से ही लोगों में सेल्फी खिंचने का शौक बढ़ गया है,
बच्चे, बूढ़े और जवान और लड़कियां व महिलाए  सभी इसकी आदत से ग्रसित हैं.

सेल्फिटिश रखा गया है इस रोग का नाम

लोगों की इस बढ़ती आदत पर अमरीका के प्रतिष्ठित अमरीकन साइकाईट्रिस्ट एसोसिएशन (एपीए) का कहना है कि सेल्फी लेना मानसिक रोगी होने की निशानी है, इस बीमारी का नाम ‘सेल्फिटिश’ रखा है.
एसोसिएशन ने यह दावा किया है कि दिन में तीन से चार बार सेल्फी लेना सामान्य होता है
मगर दस से 20 सेल्फी लेने वाला ‘सेल्फाइटिस’ बीमारी से ग्रस्त हो सकता है.

इसे ‘सेल्फी सिंड्रोम’ (कंजेनाइटिस बिहेवियर डिजिज) भी कहा गया है.
वही इसे लेकर मनोचिकित्सकों व मनोवैज्ञानिकों में काफी मतभेद भी देखे जा रहे है.
कुछ मनोचिकित्सक मानते हैं कि यह मनोरोग है, तो कुछ का कहना है कि यह एक शौक है.

इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर से जुड़ा है सेल्फी

इसको मनोरोग बोलने से लोगों में गलत संदेश जायेगा. यह इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर का एक हिस्सा हो सकता है.
मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों के बड़े वर्ग का मानना है कि यह वैसे लोगों में होता है, जिनमें आत्मविश्वास या मनोबल की कमी होती है.
ऐसे लोग शुरुआती डिप्रेशन के मरीज होते हैं.
ऐसे लोगों को सोशल मीडिया में डाले गये पोस्ट को लाइक करने पर गर्व होता है.
वैसे सेल्फी-मेनिया से समाज के कई छूटे हुए पहलु भी उजागर होते है.
लेकिन यदि सेल्फी लेने में सही और सुरक्षित तरीका अपनाया जाए तो यह आपके आत्म-सम्मान और सामाजिक संवेदनशीलता पर सकारात्मक प्रतिक्रिया डाल सकता है.

आप की ली गयी सेल्फी लोगो को जागरूक करने में मददगार साबित हो सकती है.
वही सेल्फी स्टिक ने फोटोग्राफी को नया आयाम दिया है,
इससे खुद की तस्वीरे लेना बेहद आसान हो गया है.
काफी सरल तरीके से इसका व्यवहार करके मनचाही खुद की शानदार तस्वीर ले सकते है, जो इससे पहले पॉसिबल ही नहीं था.

Last updated: सितंबर 4th, 2017 by News Desk

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