जीत के दवाब में जितेंद्र तिवारी

यागशाला में आहुति देते आसनसोल नगर निगम के मेयर सह पांडवेश्वर विधायक जितेंद्र तिवारी

यूं तो तृणमूल के लिए प0 बंगाल की सभी सीटें महत्वपूर्ण है और वह सभी को जीतना चाहेगी फिर भी आसनसोल सीट उन सीटों में से एक है जिस पर ममता बनर्जी की विशेष नजर है तभी तो बांकुड़ा की विजेता उम्मीदवार मुनमुन सेन को बांकुड़ा से आसनसोल भेजा गया है इस उम्मीद में कि बाबुल सुप्रियो की सेलिब्रिटी वाली लोकप्रियता को तोड़ा जा सके।

आसनसोल, प0 बंगाल के कृषि – कानून एवं श्रम मंत्री मलय घटक का होम टाउन है ।  आसनसोल उत्तर से वो विधायक हैं और क्षेत्र में काफी पकड़ भी है लेकिन पिछली लोकसभा सीट हार जाने के कारण यह पकड़ थोड़ी ढीली पड़ी । आसनसोल से भाजपा प्रत्याशी बाबुल सुप्रियो का पहली बार जीत जाना ममता बनर्जी को काफी नागवार गुजरा और उन सभी विधायकों मंत्रियों नेताओं को फटकार लगाई गयी थी जो इस क्षेत्र में तृणमूल को जिताने के लिए जवाबदेह थे । आसनसोल से तत्कालीन तृणमूल प्रत्याशी डोला सेन,  ममता बनर्जी की काफी करीबी मानी जाती हैं तभी तो लोकसभा हार जाने के बाद उन्हें राज्यसभा से संसद भेजा गया ।

आसनसोल सीट गँवाने का इस क्षेत्र की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ा । कुल्टी की एक जनसभा में हिन्दी भाषियों को राज्य का मेहमान बताए जाने को तृणमूल की हार से जोड़ा गया और शायद ममता बनर्जी को एहसास हुआ कि इस क्षेत्र में एक हिन्दी भाषी नेता की जरूरत है ।  विकल्प के तौर पर जितेंद्र तिवारी को चुना गया ।

वर्ष 2015 में तृणमूल के कब्जे में आए आसनसोल नगर निगम के मेयर के लिए जितेंद्र तिवारी की घोषणा सभी के लिए चौंकाने वाली थी। काफी देर से और लंबे विचार-विमर्श के बाद आया था यह फैसला । रानीगंज , जमुड़िया, कुल्टी को मिलाकर एक बड़ा आसनसोल नगर निगम बनाए जाने के निर्णय की भी काफी आलोचना हो रही थी। जितेंद्र तिवारी को यह ज़िम्मेदारी दी गयी थी कि वे हिन्दी भाषियों का दिल जीतें । इस बात में कोई संदेह नहीं कि जितेंद्र तिवारी ने आसनसोल क्षेत्र में तृणमूल की गिरते ग्राफ को काफी हद तक संभालने में कामयाबी पायी।

मेयर चुने जाने के अगले वर्ष ही 2016 के विधानसभा चुनाव के लिए पाण्डेश्वर से उन्हें आसनसोल के वर्तमान माकपा प्रत्याशी गौरंगों चटर्जी के खिलाफ उतारा गया । बहुत कड़े टक्कर में उन्होने गौरंगों चटर्जी को पाँच हजार मतों के अंतर से हराया । तब से जितेंद्र तिवारी का कद बहुत ऊंचा हो गया । इसी चुनाव में रानीगंज और जामुड़िया विधानसभा माकपा ने जीत लिया । रानीगंज, जामुड़िया विधानसभा और आसनसोल लोकसभा की हार ने पूरे कोयलांचल का भविष्य बदल दिया साथ ही उस पहचान को बदल दिया जिसके लिए ममता बनर्जी सबसे मुखर थी । (इस पर विस्तृत चर्चा अगले लेख में)

पाण्डेश्वर विधान सभा जीतने के बाद जितेंद्र तिवारी इस क्षेत्र में एक बहुत बड़े नेता के रूप में उभरे और उन्होने तृणमूल का कुनबा बड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ तक कि दुर्गापुर नगर निगम के चुनाव में भी जितेंद्र तिवारी की काफी दखल थी। वे किसी भी तरीके से दुर्गापुर जीतकर ममता बनर्जी को तोहफे में देना चाहते थे। अपूर्वा मुखर्जी के विश्वनाथ पड़ियाल के हाथों चुनाव हार जाने के कारण और दुर्गापुर में नेतृत्व संकट खड़ा हो गया था जिसकी भरपाई अभी तक ठीक से नहीं हो पायी है।

दुर्गापुर नगर निगम चुनाव को किसी भी तरीके से जीतने की प्रक्रिया ने तृणमूल को अंदरूनी नुकसान पहुंचाया । हालांकि तृणमूल पार्टी में जितेंद्र तिवारी का कद और भी ऊंचा हो गया। किसी भी तरीके से चुनाव जीतने की मंशा 2018 के पंचायत चुनाव में पूरे प0 बंगाल में देखी गयी जिसने तृणमूल की साख को काफी क्षति पहुंचाई । इस विषय पर बाद में चर्चा करूंगा फिलहाल बात हो रही है चुनाव के परिणामों से जितेंद्र तिवारी के बढ़ते कद की। बीच-बीच में जितेंद्र तिवारी और मलय घटक में टकराव की भी खबरें आती रही जो कि उनके बढ़ते कद का ही परिणाम था ।

अब जितेंद्र तिवारी ने नए-नए प्रयोग करने शुरू किए। हिन्दुत्व की ओर झुकाव का उनका प्रयोग मेरे हिसाब से प0 बंगाल में पहली बार उनका ही था। उनके बाद फिर परिस्थिति को भाँपते हुये ममता बनर्जी ने भी हिन्दुत्व की ओर झुकाव दिखाना शुरू किया । जितेंद्र तिवारी ने जितने मंदिरों, यज्ञ स्थलों, पूजा कार्यक्रमों का उद्घाटन किया या उसमें शामिल हुये है उसकी सूची बनाई जाए तो वह भी एक रिकॉर्ड ही होगी।

जितेंद्र तिवारी के नरम हिंदुत्ववादी रवैये के कारण अपने क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी इसी बीच रानीगंज – आसनसोल दंगा ने क्षेत्र की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया। प0 बंगाल के दूसरे हिस्से से भी आ रही खबरों ने काफी असर किया। जनता के मन में थोड़ी खटास आ चुकी थी लेकिन जितेंद्र तिवारी का राजनीतिक कद बरकरार रहा।

जितेंद्र तिवारी ने मेयर, विधायक के साथ-साथ संगठन में भी बड़ी भूमिका निभाई। उनके बढ़ते कद को देखते हुये ही आम जनता में एक संदेश चला गया था कि इस बार सांसद का टिकट भी इन्हें ही दिया जाएगा । यही संदेश अब जितेंद्र तिवारी के खिलाफ जा रहा है तभी तो मुनमुन सेन को जिताने का दवाब सबसे अधिक जितेंद्र तिवारी पर ही है। कम से कम अपने क्षेत्र से जिताने का दवाब तो उन पर ही है। चूंकि उनका क्षेत्र बहुत बड़ा है इसलिए दवाब भी अधिक है ।

आसनसोल नगर निगम में आसनसोल उत्तर, आसनसोल दक्षिण, कुल्टी , जामुड़िया और रानीगंज विधानसभा का बड़ा हिस्सा आता है। पाण्डेश्वर के विधायक वे स्वयं हैं। उनके क्षेत्र से बाहर एक मात्र विधानसभा बाराबनी है। रानीगंज हारा हुआ सीट है इसलिए इसका अतिरिक्त भार भी जितेंद्र तिवारी के कंधे पर ही है। जामुड़िया भी हारा हुआ सीट है लेकिन वहाँ के पूर्व प्रत्याशी शिवदासन दासु के जिलाध्यक्ष होने के कारण वहाँ का भार कुछ कम है। आसनसोल दक्षिण के विधायक तापस बनर्जी को सांगठनिक भूमिका में कम देखा गया है।

कुल्टी के विधायक उज्ज्वल चटर्जी पर पिछली लोकसभा में हार का साया अभी तक है। वह भी तब जबकि कुल्टी क्षेत्र से 2014 में करारी शिकस्त के बावजूद 2016 का चुनाव वे भारी मतों से जीते । उन्होने भाजपा प्रत्याशी अजय कुमार पोद्दार को करीब बीस हजार मतों से हराया था । उनके मतदाता चुनाव के हिसाब से वोट देते हैं , पार्टी के हिसाब से नहीं। इन सभी क्षेत्रों में जितेंद्र तिवारी एक सक्रिय एवं कप्तान की भूमिका में हैं । तभी तो उन्होने एक कर्मी सभा में हर जीत पर और अधिक काम देने का घोषणा किया । इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि जिस क्षेत्र से तृणमूल हारेगी उस क्षेत्र को कम काम मिलेगा अर्थात कम विकास होगा । ऐसी घोषणा किसी तरीके से लोकतान्त्रिक नहीं कही जा सकती है। वोट के आधार पर विकास कार्य करने की घोषणा करना लोकतान्त्रिक प्रणाली का गला घोंटने के समान है। इसी घोषणा से समझा जा सकता है कि जितेंद्र तिवारी कितने दवाब में हैं।

चूंकि आसनसोल मलय घटक का होम टाउन है । मंत्री होने के नाते पिछली जीत की ज़िम्मेदारी भी उनपर थी। इस बार ज़िम्मेदारी बंट गयी है और उसका बड़ा हिस्सा जितेंद्र तिवारी के कंधे पर है। तृणमूल की अंदरूनी गुटबाजी किसी से छुपी हुई नहीं है।

आसनसोल लोकसभा सीट पर मुनमुन सेन लड़ जरूर रही है लेकिन जीत का दवाब क्षेत्र के नेताओं पर है। यदि इस सीट से मुनमुन सेन जीतती है तो उसका श्रेय लेने के लिए कई नेता आ जाएंगे लेकिन यदि हारती है ठीकरा जितेंद्र तिवारी के माथे ही फोड़ा जाएगा । शायद यही वजह है कि जितेंद्र तिवारी ने पहले ही यह घोषणा कर दी है उनके क्षेत्र से हारने पर वे मेयर पद से इस्तीफा दे देंगे।

इस खबर के प्रायोजक हैं : Bengal Press - Asansol

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Last updated: अप्रैल 4th, 2019 by Pankaj Chandravancee

Pankaj Chandravancee Pankaj Chandravancee
Chief Editor (Monday Morning)
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