पुनर्जीवित होगा आसनसोल के विकास का गवाह यह भवन

आसनसोल के विकास का गवाह डूरैंड सिनेमा हॉल

डुरांड इंस्टीच्युट भारतीय रेल का प्रथम मनोरंजन क्लब

आसनसोल -प्रवेश द्वार के पास आज भी एक स्मृति चिन्ह मौजूद है, जिसपर द्वितीय विश्व युद्ध में अपने जीवन को कुर्बान करने वाले यूरोपियन सैनिकों के नाम अंकित हैं। आसमान को चूमती हुई ऊंची टॉवर उन्हीं दिवंगत आत्माओं को समर्पित किया गया है। यह टॉवर गुजरने वाली राजधानी एक्सप्रेस, व्यस्त मार्गों तथा आज की सतत बढ़ रही यातायाती भी़ड़ को देखती है। अपने अलौकिक सुंदरता तथा स्वर्णिम इतिहास के साथ यह कभी आराम के क्षणों में किए जाने वाले गतिविधियों के रूप में गुंजायमान रहा करता था। आसनसोल में आज भी यह भारतीय रेल का एक खूबसूरत किंतु विशाल ढ़ांचे के रूप में विद्यमान है। चारों तरफ रेलवे आवास के साथ-साथ मजबूत चारदीवारियों से घिरे विशाल मात्रा में अपने साथ जमीन को समेटे अपने मस्तक को गर्व से ऊंचा उठाए खड़ी यह इमारत डुरांड इंस्टीट्यूट है जो आसनसोल का एक आदर्श स्थान है

यह भवन यहाँ से गुजरने वालों को करती है बहुत आकर्षित

1987 से विवेकानंद इंस्टीट्यूट के नाम से जाना जाता है। अपने अद्भूत भवन कला, विरासत तथा अभिमान को समेटे ब्रिटिश साम्राज्य का यह स्मृति चिन्ह,आज भी गुजरने वालों को आकृष्ट कर लेती है। इसके अद्भूत ढ़ांचें से जुड़ी इसकी विशाल टॉवर,बॉल रूम तथा हरिभरी घासों वाली आंगन किसी को भी अपने अकथित इतिहास के बारे में कल्पना करने के लिए बाध्य कर सकती है। आसनसोल के निर्माण अवधि के शैशव अवस्था के दौरान 187 8 में यह स्थापित हुआ था। यह भारत में ब्रिटिश राज्य के उतार-चढ़ाव का गवाह है तथा अब यह इतिहास का एक भाग बन गया है।

आसनसोल के विकास यात्रा का गवाह

आसनसोल के बीच खड़ा यह ढ़ाचा आसनसोल के प्रारंभ से लेकर अब तक के विकास यात्रा का भी गवाह है। यदि हम उत्सुकतावश अतीत को देखेंगे तथा इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो हम सभी यह जान जाएँगे कि शेरगढ़ परगना का आसनसोल मौजा को नौकरी एवं रामकृष्ण राय ,दो बहादुर योद्धाओं को जिन्होंने 18 वीं शताब्दी में बारगी के चढ़ाई के खिलाफ लड़ा एवं बचाया था, पुरूलिया के काशीपुर के महाराजा के द्वारा उपहार में दिया गया था। इसके बाद ही आसनसोल गॉव अस्तीत्व में आया।यहाँ तक कि ब्रिटिश के आने के पूर्व कोयले के खान का पता लगा था। 17वीं शताब्दी में नमक के व्यापारी अपने उत्पादों को बेचने के लिए यहाँ आते थें तथा अपने नौका में कोयला लाद कर ले जाते थें।

इस छोटे से गाँव ने तेजी से विकास किया

1774 में रानीगंज में कोयला निकालने का कार्य प्रारंभ हुआ। तमाम विदेशी व्यक्तित्वों के मध्य एक ऐसे भी भारतीय थें जो अपने मित्र विलियम कॉर के साथ कोयले के व्यापार से जुड़े। उनका नाम द्वारका नाथ टैगोर था जो रवीन्द्रनाथ टैगोर के पितामह थें। उन्होंने कॉर-टैगोर कम्पनी को बनाया तथा इसने 1833 में रानीगंज कोलियरी का अधिग्रहण किया जो बंगाल कोल कंपनी बना। यह 1970 में कोयले के खदानों के राष्ट्रीयकरण होने तक रानीगंज क्षेत्र में प्रमुख कोयला उत्पादनकर्ता बना रहा। आसनसोल में रेल नेटवर्क के उदय के साथ ही दरकिनार पड़े इस छोटे से गाँव ने तेजी से विकास के पंख फैलाना प्रारंभ कर दिया। विदेशियों का शैलाब यहाँ उमड़ने लगा था और तिव्र औद्योगिकीकरण पनपने लगा।

उनके मनोरंजन के लिए बनाया गया इंस्टीच्युट

यह एक ऐसा युग था जब सभी इंजीनियरों, अधिकारी और कर्मचारीगण या तो यूरोपीय या फिर एंग्लो इंडियन हुआ करते थें। उनके मनोरंजन के लिए ही मनोरंजन क्लब की आवश्यकता को महसूस की गई जिसने इस इंस्टीच्युट की नींव के लिए मार्ग प्रशस्त किया। 1915 में इसे यूरोपियन इंस्टीच्युट का नाम दिया गया। यह भारतीय रेलवे का प्रथम मनोरंजन क्लब था। इस इंस्टीच्युट के मध्य का प्रयोग एक स्विमिंग पूल के रूप में हुआ करता था जिसको कालांतर में शागौन फर्शयुक्त एक शानदार बॉल रूम में बदल दिया गया। इसे मिनी हॉल(छोटी प्रेक्षागृह) के नाम से जाना जाने लगा। इसइंस्टीच्युट में लाउंज हॉल, क्लॉकरूम, पुस्तकालय, शाही शौचालय आदि शामिल थे। क्लब के उपयोगकर्ताओं को खुद को तनावमुक्त एवं आराम करने के लिए बिलियर्ड, स्नूकर, बैडमिंटन और टेनिस खेलने के लिए पर्याप्त अवसर था।

भारतीयों को इस इंस्टीच्युट में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी

ऐतिहासिक डूरंड सिनेमा हाल
ऐतिहासिक डूरंड सिनेमा हाल

इतिहास के उन लमहों में किसी‍ भी, भारतीयों को इस इंस्टीच्युट में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। 1925 में इसे सर हेनरीमार्टिमर डुरंड जो अफगनिस्तान और पाकिस्तान के बीच डुरांड लाईन खिंचने के लिए प्रख्यात थें, के नाम पर डूरांड इंस्टीच्युट के रूप में पुनः नामकरण किया गया। डुरंड इंस्टीट्यूट अपने ठाठ-बाट, चकाचौंध और परंपरा के लिए प्रसिद्ध था। दूर-दराज से लोग यहाँ क्रिसमस जैसे उत्सवों में खुद को भिगोने के लिए आया करते थें। उन्हें यहाँ ड्रेस कोड का अनुसरण करना होता था तथा उन्हें त्यौहारों में नृत्य स्थान( डांस फ्लोर) प्राप्त करना काफी कठिन होता था। स्वतंत्रता के बाद 1947 में, भारतीयों को डुरंड इंस्टीच्युट में प्रवेश करने की अनुमति मिली। लेकिन साठ के मध्य तक उन्हें ड्रेस कोड का अनुसरण करना पड़ता था। प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को मुफ्त में सिनेमा को पर्दों पर दिखाया जाता था। साठ के दशक में कई हालीवुड सितारों को देखने के लिए सिनेमा प्रेमी प्रेक्षागृह को पूरी तरह से भर दिया करते थे।

राहगिरों को अपनी अनगिनत कहानियों से रूबरू कराती रहती है

1987 से, डुरंड इंस्टीट्यूट को विवेकानंद इंस्टीच्युट के नाम से जाना जाने लगा। अब यहाँ कोई बॉल नहीं होते, लेकिन फिर भी यह इंस्टीच्युट बाहरी दुनियाँ के भीड़म भीड़ से भरी राहगिरों को अपनी अनगिनत कहानियों से रूबरू कराती रहती है। यह निर्णय लिया गया है कि इस रेलवे इंस्टीच्युट को इसकी रंगीन और सम्पन्न विरासत को अक्षुण्ण रखते हुए इसका कायाकल्प तथा जिर्णोद्धार किया जाए। पी.के.मिश्रा, मंडल रेल प्रबंधक ने सर्व संबंधित को यह निर्देश दिया है कि इस इंस्टीच्युट के पुराने ढ़ांचे तथा विरासत को बचाते हुए इसके अतीत की मर्यादा को पुनर्बहाल किया जाए। इसके लिए कार्यवाही प्रारंभ की जा चुकी है तथा इसे इसकी पुरानी पहचान दिलाने के लि‍ए योजना बना ली गई है एवं यह नई परिधान ग्रहण करने जा रही है।

सैकड़ों वर्ष पुरानी इंस्टीच्युट को आधुनिकीकरण किया जायेगा

सैकड़ों वर्ष पुरानी इंस्टीच्युट को पूरी तरह से वातानुकूलित करने की प्रत्येक व्यवस्था कर ली गई है। दर्शक समुदाय को एक नवीन अनुभव कराने के प्रयोजनार्थ इसमें एक नई ध्वनिक प्रणाली को भी विकसित किया जाएगा। इसके हरी-भरी उद्यान को अलंकृत करने के साथ-साथ इसके अंदरूनी शौचालयों को भी पुनर्निर्मित किया जाएगा। मुख्य प्रवेश द्वार और क्षतिग्रस्त चारदीवारी का मरम्मत और नवीकरण भी किया जाएगा। मुख्य प्रवेश द्वार के पास पुरानी क्लॉक टॉवर तथा उससे सटे हुए टेबल टेनिस रूम को भी ठीक करने की कोशिश जारी है। एक बार ये कार्य सम्पन्न हो जाए तो विवेकानंद इंस्टीच्युट का उपयोग राज्य या राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन केंद्र के रूप में किया जा सकेगा।

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Last updated: मार्च 14th, 2018 by News Desk

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