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कोलकाता की पहचान-हावड़ा ब्रिज, विक्टोरिया मेमोरियल, हाथ रिक्शा

कोलकाता -आधुनिक और इतिहासिक संगम का बेजोड़ शहर है, पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता, इस महानगर को सिटी ऑफ़ जॉय के नाम से भी जाना जाता है. यह शहर अमीर -गरीब सभी के लिए बेहद सूटेबूल है. असमानों को छुती गगनचुम्बी इमारते है तो फुटपाथ पर गुजारा करने वालों की भी कमी नहीं. वैसे इस शहर की एक खास बात भी है, जो शायद पूरे देश में आपको नहीं दिखेगी. यहाँ बस, ट्राम, मेट्रो, रेल के साथ एक परिवहन और भी है, जो काफी लोकप्रिय है. यहाँ चलने वाली हाथ रिक्शा का सफ़र काफी आनंदित और अनुभवी है. जबकि देशभर में हाथ रिक्शा बंद हो चुका है.

कोलकाता की हावड़ा ब्रिज और विक्टोरिया मेमोरियल के बाद तीसरी पहचान है हाथ रिक्शा. शदियों की विरासत समेटे श्रम-दासता का प्रतिक इस हाथ रिक्शा की कहानी भी काफी दिलचस्प और दुखद है. जानकारों के अनुसार हाथ रिक्शे की परम्परा ब्रिटिश सरकार की देंन है और सबसे पहले वर्ष 1880 में शिमला में हाथ रिक्शे की शुरूआत हुई. जिसके बाद वर्ष 1914 में यह कोलकाता पहुँचा. ब्रिटिश भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता में हाथ रिक्शा ब्रिटिश महिलाओं की सैर-सपाटे के लिए लाया गया था. अंग्रेजो कि मानसिकता के मुताबिक गरीब भारतीयों पर सर्वोच्चता भी स्थापित करना था.

हालांकि वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने हाथ रिक्शा पर प्रतिबंध लगाकर चालकों के पुनर्वास की घोषणा की, जो सिर्फ घोषणा ही बनकर रह गया. तभी से ये कोलकाता वासियों के लिए मुख्य यातायात का साधन बना हुआ है. बरसात के दौरान जब शहर की तंग गलियाँ तालाब में तब्दील हो जाती है, जहाँ टेक्सी, ऑटो आदि जाने साफ इंकार कर देते है, तभी शहरवासियों का एक मात्र सहारा होता है हाथ रिक्शा, और बंदी के दौरान तो ये किसी फ़रिश्ते से कम नहीं होते. जिससे इनकी लोकप्रियता अभी तक बरकरार है. लगभग 6 हजार चालक इस कार्य से जुड़े हुए है.

जिनमें बिहार-झारखण्ड के लोग अधिकंश है, जो सुबह से शाम तक आपको शहर में खाक छानते दिख जाएँगे. एक हाथ रिक्शा चालक मोoअसलम ने बताया कि वह तीस वर्षी से यह कार्य कर रहे है, रिक्शा भाड़ा में लिए है और रिक्शा मालिक को प्रत्येक दिन 30 रुपये देते है. वो अपने इस कार्य से खुश है और कहते है कि इससे हमारा और परिवार का गुजर-बसर हो जाता है. हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार की तरफ से रोजगार का कोई दूसरा विकल्प मिल जाये तो काफी अच्छा होगा.

कोलकाता के हाथ रिक्शे ने देश-विदेश के लोगो, साहित्यकार, लेखक, फोटोग्राफर और बोलीवुड को भी काफी प्रभावित और आकर्षित किया है. वर्ष 1952 में बनी हिंदी फिल्म दो बीघा जमीन से लेकर वर्तमान फिल्म बुलेट राजा तक हाथ रिक्शे का जादू बरकरार है. कई फिल्मो में नायक हाथ रिक्शा चालक की भूमिक में नजर आये है.

Last updated: सितंबर 7th, 2018 by News Desk

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