चारा घोटाला फैसला- बैकवर्ड बनाम फॉरवर्ड

चारा घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्रा के बरी होने और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के दोषी करार होने के बाद सोशल मीडिया पर इसे जातीय आधार से जोड़कर न्याय व्यवस्था पर सवाल किए जा रहे हैं। पार्टी समर्थक अथवा साधारण लोगों के द्वारा ऐसे सवाल किए जाते है तो यह मायने नहीं रखता पर बहुत सारे काबिल और विद्वान लोगों की जातीय टिप्पणी आहत करने वाली है।

खैर, अब हम यदि न्यायिक फैसले पे गंभीरता से गौर करें तो सारे मामले साफ हो जाएंगे। देवघर कोषागार से एक 89.4 लाख की अवैध निकासी के मामले में कुल 22 आरोपी थे जिनमें से 16 दोषी करार दिए गए और 6 निर्दोष। अब न्यायिक व्यवस्था को जातिवादी चश्मे से देखने वाले लोगों को 16 दोषी करार दिए गए लोगों की जातीय पड़ताल भी करनी चाहिए। जिन 16 लोगों को दोषी करार दिया गया है उनमें लालू प्रसाद यादव के अलावा बिहार के पूर्व सांसद जगदीश शर्मा, पूर्व विधायक डॉ आर के राणा, पूर्व पशुपालन सचिव बेक जूलियस, पूर्व सचिव महेश प्रसाद, पूर्व वित्त आयुक्त फूलचंद सिंह, पूर्व सरकारी अधिकारी सुधीर कुमार भट्टाचार्य, डॉ कृष्ण कुमार प्रसाद, आपूर्तिकर्ता त्रिपुरारी मोहन प्रसाद, सुशील कुमार, सुनील कुमार सिन्हा, अनिल गांधी, संजय अग्रवाल, गोपीनाथ दास, ज्योति कुमार झा एवं राजेंद्र प्रसाद शर्मा शामिल हैं। जिन लोगों को माननीय न्यायालय ने बरी करार दिया है उनमे डॉ जगन्नाथ मिश्रा के अलावा बिहार के पूर्व पशुपालन मंत्री विद्यासागर निषाद, लोक लेखा समिति के पूर्व अध्यक्ष ध्रुव भगत, आयकर आयुक्त चंद्र चौधरी, आपूर्तिकर्ता सरस्वतीचंद्र और साधना शामिल है।

अब इन उपर्युक्त नामों के जातियों का विश्लेषण करें तो समझदार लोग यह समझ सकते हैं कि अगड़े और पिछड़े दोनों जातियों के लोगों को न्यायालय में दोषी और बरी करार दिया है। न्यायालय जातीय आधार पर अपने फैसले नहीं सुनाते। साक्ष्य और गवाह न्यायालय के फैसले के लिए प्रमुख वजह होती है। हालांकि न्याय व्यवस्था की कमियों पे बड़े संदर्भों में टिपण्णी नहीं की जा सकती है। कमियों से ज्यादातर लोग बाकिफ है। यहां इस खास संदर्भ की ही चर्चा हो रही है।

बात अगर जातिवादी चश्मे से न्यायिक फैसले को देखने की है तो 3 अक्टूबर 2013 को चाईबासा कोषागार से हुए 38 करोड़ की अवैध निकासी के मामले में सीबीआई के विशेष न्यायधीश प्रभास सिंह ने लालू प्रसाद यादव को पांच साल, जगन्नाथ मिश्रा को चार साल, जगदीश शर्मा को चार साल, आरके राणा को पांच साल की सजा दी। इसी सजा के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप सभी नेता ग्यारह साल तक चुनाव लड़ने से वंचित घोषित हो गए। कुछ काबिल लोग तो यह भी कह रहे कि एक ही घोटाले में कितनी सजा होगी। उनको नहीं पता कि अलग अलग जिलों में अलग अलग प्रथमिकी दर्ज हुई है।

खैर, बिहार का 90 का दशक अपराध के जातीय समीकरण का चर्मोत्कर्ष था। उन दिनों सभी जातियों के पास अपने अपने रंगदार थे। सभी को जातीय जामा पहनाकर संरक्षित किया जाता था। उन्हीं जातियों में से कई लोग तो ऐसे थे जो अपने स्व जातियों के हत्या से भी नहीं झिझके। वैसे कुछ लोग आज जाति संरक्षण पाकर अपनी धन संपदा बढ़ाते जा रहे हैं। अपराधियों को जाति संरक्षण मिलना एक समान सी बात है पर अपराधियों की कोई जाति नहीं होती। वे अपने हित मे जाति का उपयोग करते है।

अपराध करने वालों के लिए जातीय और धार्मिक चोला पहनना सबसे आसान है और आम लोगों का जयकारा लगाना भी परंतु विद्वान और काबिल लोग जब ऐसा करेंगे तो हमारा देश और समाज फिर से कबीलाई युग की ओर जाने को अग्रसर हो जायेगे।।। जरा सोंच के देखिये चारा घोटाले में किस जाति के गरीब लोगों का नुकसान हुआ होगा..।।

ब्लॉग चौथा खंभा

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Last updated: दिसंबर 25th, 2017 by Arun Sathi

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