इंडिया आखिर क्यों लड़ेगा ? क्यों जीतेगा और क्यों हारेगा ?

क्रिकेट वर्ल्ड कप का सीजन है और भारत की तपती गर्मी में लोग क्रिकेट के बुखार से तप रहे हैं । हमारे न्यूज़ चैनल जोशीले एपिसोड बनाकर तपिश को और भी बढ़ा रहे हैं।

“इंडिया जीत गया “” यह शब्द कानों ठंडक देता है, “इंडिया जीतेगा” शब्द मन में जितना जोश और ऊर्जा भर देता है, “इंडिया हार गया “” शब्द उतना ही चुभता भी है।

खेल है हार-जीत तो लगी रहती है । कभी-कभी यह खेल से ऊपर उठकर देश की अस्मिता को चोट करने लगता है। इंडिया-पाकिस्तान के मामले में अक्सर ऐसा होता है।

बाप-बेटा के जुमला में इंडिया की  काफी किरकिरी हुई थी

पाठकों को याद होगा इंडिया-पाकिस्तान को लेकर बाप-बेटा वाला जुमला खूब चर्चा में आया था । इंडिया के हारने पर पवेलियन जाते हुये भारतीय खिलाड़ी से एक पाकिस्तानी समर्थक ने पूछ दिया था कि अब बता बाप कौन ? सोशल मीडिया में भी खूब किरकिरी हुयी थी ? इस तरह की घटनाओं से उनलोगों को भी तकलीफ होती है जो क्रिकेट में रुचि नहीं रखते हैं।

मेरा सवाल है कि आखिर एक खेल देश की अस्मिता से क्यों जुड़ जाता है या उसे जोड़ दिया जाता है ? क्रिकेट मैचों को इस तरह से क्यों पेश किया जाता है मानों दो देशों के बीच कोई जंग लड़ी जा रही हो ।

इंडिया आखिर क्यों लड़ेगा ? क्यों जीतेगा और क्यों हारेगा ?

क्या इस जीत-हार में वाकई इंडिया की कोई भूमिका होती है या केवल इंडियन की भावनाओं का व्यापार किया जाता है।

बात जब इंडिया की होती है तो बात होती इंडिया के करीब 133 करोड़ आबादी की । क्या इस हार-जीत में इन 133 करोड़ आबादी की कोई भूमिका होती है ? क्या इस आबादी ने उन लोगों को ये अधिकार दिया है कि वो इंडिया के तरफ से लड़े और जीतें ।

जिस प्रकार इंडिया ने भारतीय सेना को यह अधिकार दिया हुआ है कि वे भारत की तरफ से लड़े। भारत सेना की चयन प्रक्रिया भारत के नागरिकों द्वारा बनाए गए कानून से संचालित होती है क्या ये सब भारतीय क्रिकेट के साथ लागू है। क्या भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का गठन भारतीय कानून के तहत हुआ है ? क्या भारत सरकार इसका नियंत्रण करती है ? क्या मैच फिंक्सिंग के दोषी क्रिकेट खिलाड़ियों को भारतीय दंड संहिता के तहत सजा मिलती है । जवाब है नहीं तो फिर इंडिया क्यों लड़ेगा ? क्यों बीसीसीआई नाम की एक संस्था के खिलाड़ी इंडिया के लिए लड़ने की हारने और जीतने की बात करेंगे ?

ओलंपिक के खिलाड़ी होते हैं इंडिया के असली प्रतिनिधि

ओलंपिक में खेले जाने वाले खेल की संस्थाएं भारत सरकार के अधीन आती है इसलिए उनको पूरा हक है कि वे भारत के तरफ से खेले । ओलंपिक पदक वितरण के समय पदक के अनुसार विजेता खिलाड़ी के देश का झण्डा भी ऊंचा किया जाता है उस वक्त वास्तव में अपने देश के लिए गर्व होता है क्योंकि ओलंपिक में जीता हुआ एक स्वर्ण पदक कई वर्ल्ड कप के बराबर है। क्योंकि वो खिलाड़ी वास्तव में भारत के प्रतिनिधि होते हैं। उन्हें देश ने खेलने के लिए भेजा होता है लेकिन क्या क्रिकेट के मामले में ऐसा होता है ?

सत्ता की पकड़ से बाहर है क्रिकेट

क्रिकेट एक शुद्ध रूप से व्यावसायिक खेल है । इसके किसी भी गतिविधि पर भारत सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। अंदर खाने बहुत से भ्रष्टाचार चलते हैं लेकिन उस पर कोई कार्यवाही नहीं हो सकती है क्योंकि सरकार इस संस्था में हिस्सेदार नहीं हैं । ये बात अलग है कि सत्ता पक्ष के नेता ही इस संस्था में मुख्य कुर्सी पर काबिज रहते हैं । इस प्रकार सरकार की ओर से आने वाली अड़चनों को सत्ता पक्ष के नेता दूर कर देते हैं।

बीसीसीआई ने आईसीएल का दमन कर दिया

आईपीएल भारत में बहुत लोकप्रिय है  । लेकिन क्या आपको पता है कि आईपीएल से पहले आईसीएल की शुरूआत हुयी थी जिसे कपिल देव की अगुआई में संचालित किया जा रहा था । लेकिन बीसीसीआई ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके आईसीएल को पूरी तरह से बंद करवा दिया और उसकी जगह अपनी आईपीएल को चमकाया। बीसीसीआई की ओर से निर्देश जारी कर दिये गए थे कि आईसीएल खेलने वाले खिलाड़ी को भारतीय टीम (बीसीसीआई की टीम ) में कभी जगह नहीं मिलेगी। आईसीएल मैच के लिए क्रिकेट मैदान को अप्रत्यक्ष रूप से एक तरह बंद करवा दिया गया था । कुल मिलाकर हर वो परिस्थिति तैयार की गयी जिससे आईसीएल का दम घुट जाये और वो अपनी मौत मर जाये।

यदि बीसीसीआई निजी संस्था है तो फिर क्रिकेट का मालिक क्यों ?

आखिर ये अधिकार बीसीसीएल को दिया किसने ? बीसीसीएल चूंकि गैर सरकारी संस्था है इसलिए खिलाड़ियों के चयन में सरकार की कोई भूमिका नहीं होती है। इसलिए बीसीसीआई किसे चुनेगी और किसे नहीं यह उसकी मर्जी पर निर्भर करता है । इसलिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुये बीसीसीआई ने आईसीएल को मरने पर मजबूर कर दिया । जो कानूनी तौर पर कहीं से भी गलत नहीं दिखता है लेकिन जब बीसीसीआई हर काम अपनी मर्जी से करेगी । अपनी कमाई अपने पास रखेगी और आपस में ही बाँटेगी तो फिर उसे इंडिया का प्रतिनिधि बनने का कोई हक नहीं है।

सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत है बीसीसीआई

बीसीसीआई तमिलनाडू में पंजीकृत एक सोसाइटी है । वर्ष 1928 में सोसाइटी एक्ट के तहत इसका पंजीयन हुआ और धीरे-धीरे भारत में इसने स्वयं को क्रिकेट का स्यंभु प्रतिनिधि बना लिया  । जब यह पूर्ण रूप से निजी संस्था है । इसके सदस्यों द्वारा संचालित होने वाली संस्था है तो फिर इसे कोई हक नहीं है कि भारत में अन्य किसी क्रिकेट संस्था को पनपने से रोके ।

क्रिकेट की और भी संस्थाएं खुलनी चाहिए

यदि बिना सरकारी नियंत्रण के ही इस संस्था को परिचालित होना है तो फिर देश में और भी क्रिकेट संस्थाएं खुलनी चाहिए।  जिस प्रकार हम मनोरंजन के लिए फिल्में देखते हैं, किसी क्लब में जाते हैं, किसी डांस शो में जाते हैं और इन सब पर किसी एक संस्था या कंपनी का अधिकार नहीं है उसी प्रकार जब क्रिकेट पर सरकार का नियंत्रण नहीं है तो फिर किसी एक संस्था का अधिकार नहीं होना चाहिए । भारत में और भी कई क्रिकेट संस्थाएं होनी चाहिए, जब यह मनोरंजन का ही साधन है तो फिर इस साधन पर किसी एक संस्था का कब्जा क्यों ?

भ्रष्टाचार से लबरेज है बीसीसीआई

बीसीसीआई भ्रष्टाचार में इतनी डूबी हुई है कि वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जाँच के लिए लोढ़ा समिति का गठन किया था और उसके सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए वर्ष 2017 में चार सदस्यीय कमिटी को बीसीसीआई प्रबंधन समिति में नियुक्त कर दिया था।

जनता को करनी होगी पहल

यह तो सीधा-सीधा भ्रष्टाचार का मामला है जिसमें सरकार को तुरंत कोई ठोस निर्णय लेना चाहिए लेकिन सरकार कोई कड़ा कदम नहीं ले पा रही है क्योंकि यह देश की भावनाओं से जुड़ गया है इसलिए पहल देश की जनता हो ही करना होगा। उन्हें बीसीसीआई से पूछना होगा कि जब सारा मुनाफा आप अपने पास ही रखते हैं तो फिर भारत का प्रतिनिधित्व करने का आपको कोई अधिकार नहीं। आपके खिलाड़ी आपके लिए खेलते हैं देश के लिए नहीं । कृप्या देश को बीच में न घसीटें । आपका क्रिकेट हमें पसंद हैं और अपने मनोरंजन के लिए हम क्रिकेट देखते हैं लेकिन इस मनोरंजन पर केवल आपका अधिकार नहीं हो सकता है । इतने लोकप्रिय खेल पर एक गैर नियंत्रित संस्था का एकाधिकार सही नहीं है

क्रिकेट में इंडिया या इंडियन टीम जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए

“इंडिया-पाकिस्तान का मैच” ये शब्द ही गलत है। मैच तो बीसीसीआई और पीसीबी के बीच होता है जिसे आईसीसी नियंत्रित करती है तो फिर इंडिया बीच में कहा से आया ? क्यों बीसीसीआई अपने फायदे के लिए देश की 133 करोड़ आबादी को घसीटती है।

न कोई भारतीय टीम है और न कोई पाकिस्तानी टीम । टीम तो बीसीसीआई और पीसीबी की होती है । जिसे वे अपनी मर्जी से चुनते हैं। भारतीय टीम चुनने में न तो भारतीय जनता की कोई भूमिका है और न भारतीय सरकार की । इंडिया को बीच में घसीट कर बीसीसीआई देश की जनता के भावनाओं का व्यापार करती है । खूब मुनाफा कमाती है और आपस में बाँट लेती है। विज्ञापन के  रूप में मीडिया हाउस को भी उसका हिस्सा मिल जाता है और ठगी रह जाती है देश की जनता ।

जन भावनाओं को केवल अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना सही नहीं है

क्रिकेट देश की जनता को भरपूर मनोरंजन देता है। क्रिकेट मनोरंजन का खेल है । उसकी टीम अपने संस्था बीसीसीआई की टीम है भारत की टीम नहीं । यह किसी भी रूप से देश या देश की जनता का प्रतिनिधि नहीं है । देश ने उन्हें लड़ने(खेलने) के लिए अधिकृत नहीं किया है इसलिए उसकी हार-जीत उसकी अपनी है, देश की नहीं ।

यदि वे देश को शामिल करना चाहते हैं तो निर्णय देश लेगा कोई संस्था नहीं।

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Last updated: जून 16th, 2019 by Pankaj Chandravancee

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