भारतीय राजनीति में इतना कन्फ़्यूजन क्यों है भाई ….?

भारतीय राजनीति आम आदमी की समझ से बिल्कुल परे है । यहाँ कोई दल जो दावे करता है जरूरी नहीं कि उसका समर्थन भी करे । जिस मुद्दे का राजनीतिक विरोध करते हैं जरूरी नहीं कि वास्तव में उसके विरोधी हैं । इसके एक नहीं हजारों उदाहरण हैं परंतु मैं कुछ चर्चित उदाहरण के जिक्र करना चाहता हूँ ।

1. काँग्रेस / The Muslim women ( protection of rights on divorce)1986 : इंदिरा जी के कार्यकाल में संविधान के 42वें संसोधन द्वारा संविधान में सेक्युलर शब्द को जोड़ा गया लेकिन 1986 में एक बहुत ही साम्प्रदायिक और नारी विरोधी विधान बनाया नाम था The Muslim women ( protection of rights on divorce) 1986 . इसे शाह बानो केश में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलटने के लिए पारित किया गया था । इस विधेयक के पारित होते ही भारत की मुस्लिम महिलाओं के तलाक का बाद गुजारा भत्ता का अधिकार केवल 90 दिन तक के लिए सुनिश्चित कर दिया गया मतलब यूं कहें अब तलाक़ के बाद मुस्लिम महिलायेंं गुजारा भत्ता की मांग नहीं कर सकती थी और यहीं से जन्म हुआ मजाक मजाक में तीन तलाक़ कहने वाली गलत परंपरा का ।

तो हमने देखा कि जिस दल ने देश को पहली महिला प्रधानमंत्री दिया, जिस दल में पहली महिला अध्यक्ष हुई एवं जिस दल ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान संशोधन करके डाला उसी दल ने मुस्लिम महिलाओं के जीवन और अधिकारों पर कठमुल्लों को राज करवाने के लिए उच्चतम न्यायालय का निर्णय पलट दिया ।

2. कॉंग्रेस पार्टी सदैव बाबरी विध्वंस के खिलाफ रही है परंतु कॉंग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल में विवादित ढांचा गिरा दिया गया और रामलला को स्थापित किया गया । कॉंग्रेस के ही प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने राम मंदिर पर लगा ताला 1986 में खुलवाया जो कि 1949 से लगा था । 1989 में बीजेपी इस मुद्दे में कूद गई 1990 में रथयात्रा हुई और फिर तब से ये राजनीतिक मुद्दा बना ।

इसी कॉंग्रेस ने कोर्ट में हलफनामा दिया कि राम एक काल्पनिक चरित्र हैं । इसी कॉंग्रेस के कई नेता वकील बनके कोर्ट में राम मंदिर के खिलाफ लड़ रहे हैं। यही कॉंग्रेस है जो बीजेपी से बार-बार पूछती है कि मंदिर कब बनाओगे या यूं कहें उकसाती है ।

3. बसपा / एससी-एसटी एक्ट, मायावती जी ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए दो शासनादेश जारी किए दिनांक 20 मई 2007 एवं 29 अक्टूबर 2007 जिसमें कहा कि SP खुद ऐसे मामलों का संज्ञान लें और किसी निर्दोष पर इसका दुरुपयोग न होने दें, इसके बाद तत्काल गिरफ्तारी वाली घटनाओं में कमी आई ।

बाद में जब 20 मार्च 2018 को उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में एससी / एसटी एक्ट के अंतर्गत बिना जाँच गिरफ्तारी पर रोक लगा दी और अंतरिम जमानत का भी प्रावधान किया तो यही मायावती थीं जिन्होंने संसद से सड़क तक आग लगा दिया और सरकार पर दबाव बनाया कि कानून बनाकर उच्चतम न्यायालय के आदेश को पलटा जाय और आखिर में सभी दलों की सहमति से उस आदेश को पलट दिया गया ।

तो यहाँ हमने देखा मायावती मुख्यमंत्री रहते इस धारा के दुरुपयोग को रोकने के लिए शासनादेश जारी करती हैं और सत्ता जाने के बाद दुरुपयोग की आज़ादी मांगती हैं ।

3. एससी / एसटी Reservation in Minority Institution: भारत का जब संविधान बना तो एससी/एसटी आरक्षण का प्रावधान किया गया तब से अनवरत भारत की सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर आरक्षण को बढ़ाते रहने का काम किया परंतु दो ऐसी जगह है जहाँ आरक्षण की मांग का सभी दलित चिंतक पार्टियाँ विरोध कर रही है । वो जगह है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय इन्हें अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त है अतः यहाँ 50 % सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित होती परंतु बाकी बची सीटों में या कुल सीटों एससी /एसटी आरक्षण शून्य है । वर्षों से यहाँ आरक्षण की मांग उठती आयी है परंतु आश्चर्य ये है इसका सबसे ज्यादा विरोध दलित चिंतक पार्टियाँ ही कर रही है।

4.भाजपा / एफ़डीआई : भारतीय जनता पार्टी ने सदैव ही खुदरा बाजार (retail sector) में विदेशी निवेश का विरोध किया परंतु सत्ता में आने के बाद इसके विपरीत दो निर्णय लिए पहला ये की सिंगल ब्रांड रिटेल में 100% विदेशी निवेश की छूट दे दिया । दूसरा ये की इन्शुरन्स सेक्टर में FdI की लिमिट 26 से 49% कर दिया ।

भाजपा / एयर इंडिया : कॉंग्रेस पार्टी ने अपनी गलत और अति महत्त्वाकांक्षी नीतियों की वजह से एयर इंडिया को कर्ज के सागर में डूबा दिया फिर इसके कर्ज़ से मुक्ति पाने के लिए एयर इंडिया को दुबई की इत्तेहाद एयरलाइन को बेचने का निर्णय किया और डील भी कर लिया ।

भाजपा ने उस समय इसका प्रखर विरोध किया और इसे नेशनल कैरियर होने के नाते से इत्तेहाद के साथ डील को अपमान जनक कहा । आज यही बीजेपी है जो एयर इंडिया को किसी भी कीमत पर बेचने को तैयार है ।

एक ताजा उदाहरण तो मैं लगभग भूल ही गया था ।

25 जुलाई 2019 को आरटीआई अमेंडमेंट बिल पर जब चर्चा हो रही थी तो सम्पूर्ण विपक्ष इसका विरोध कर रहा था, कुछ पार्टियों ने तो वाक आउट भी कर दिया, सत्तारूढ़ दल के भी कई नेता इसके विरोध में थे परंतु जब इसपे मत विभाजन हुआ तो यह ध्वनि मत से पारित हुआ । इसे मतविभाजन से पहले विशेष कमिटी को भेजने के प्रस्ताव वे वोटिंग हुई तो मात्र कुल 75 मत पड़े पक्ष में । मानो ऐसा लग रहा है जैसे विपक्षी दल सदन में अपने भाषणों से जनता को गुमराह कर रहे थे और मतदान बिल के पक्ष में कर रहे थे ।

कुल मिलाकर हम देखें तो भारतीय राजनीति में बहुत ज्यादा कंफ्यूजन है । सरकारें बदलती हैं नीतियाँ नहीं बदलती । प्रशासन का रवैया नहीं बदलता ।

व्यक्तिगत रूप से मैं वर्तमान केंद्र सरकार की कुछ नीतियों से बहुत नाराज हूँ वहीं बहुत सी नीतियों से प्रसन्न और संतुष्ट हूँ । सम्पूर्ण असंतुष्टि का भाव न होना भी भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ संयोग ही है ।

मेरा लेख ध्यान से पढ़ने के लिए धन्यवाद !

– इंजीनियर सूरज कुमार  राम (नई दिल्ली )

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Last updated: जुलाई 28th, 2019 by News Desk Monday Morning
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