जेएनयु चुनाव में साबित हुआ कि ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है- कांग्रेस

अजय मकान, वरिष्ठ प्रवक्ता, एआईसीसी और अध्यक्ष डीपीसीसी; सुश्री रुची गुप्ता, संयुक्त सचिव, आई / सी एनएसयूआई; और  फिरोज खान, अध्यक्ष  एनएसयूआई ने आज एआईसीसी मुख्यालय में मीडिया को संबोधित किया।

ईवीएम गड़बड़ी के कारण बार बार काउंटिंग रोकनी पड़ी

अजय माकन ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि कल दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव हुए और पिछले छह वर्षों में सबसे बेहतर परफोर्मेंस हमारे एनएसयुआई का रहा है। तो हमारे एनएसयुआई के अध्यक्ष फिरोज खान को और जो इंचार्ज एनएसयुआई के हैं, एआईसीसी से ज्वाइंट सेक्रेटरी हैं, रुचि गुप्ता। इन दोनों को सबसे पहले बधाई देना चाहते हैं। आप लोगों को सबको पता ही होगा कि तीन बार काउंटिंग को स्थगित करना पड़ा, ईवीएम के चलते। छठे राउंड तक हमारे एनएसयुआई के प्रेजिडेंट और सेक्रेटरी बहुत अच्छी वोट से आगे जीत रहे थे और ज्वाइंट सेक्रेटरी के अंदर एकदम नेक-टू मुकाबला चल रहा था, कभी कोई ऊपर, कभी कोई ऊपर। छठे राउंड तक कम से कम ऐसी स्थिति थी और उसके बाद भी प्रेजिडेंट की पोस्ट के ऊपर आखिरी राउंड तक कभी 50 वोट से ऊपर, कभी 150 के ऊपर इस तरह से चलता रहा।

खराब ईवीएम से एवीबीपी को ही मदद क्यों मिली ?

लेकिन जो सबसे बड़ा प्रश्न जो हम लोगों ने कल भी उठाया और आज भी आपके माध्यम से उठाना चाहते हैं कि जो ईवीएम हैं, वो सब के सब ईवीएम जब खराब हो जाते हैं तो ऐसा क्यों होता है कि ईवीएम खराब होते ही, बीजेपी, एबीवीपी की मदद करते नजर आते हैं। कभी कोई ईवीएम हमें ऐसा नजर नहीं आया जो जब खराब हो गया हो तो कांग्रेस की या एनएसयुआई की मदद करते नजर आया हो। तो ये ईवीएम के अंदर सेक्रेटरी पोस्ट के ऊपर 40 वोट, 10 नंबर बैलेट के ऊपर पड़े, जबकि कुल कैंडिडेट ही उसमें 8 थे। जो हमारा एनएसयुआई का कैंडिडेट 6,000 वोट से जीता है, सेक्रेटरी की पोस्ट पर, उसको उस ईवीएम के ऊपर जीरो वोट पड़ रहे हैं औऱ 40 वोट 10 नंबर कैंडिडेट को पड़ रहे हैं। तो ये तो ऐसी चीज थी जो एकदम भ्रामक और साफ थी जो सबके सामने आ गई और सब लोगों ने उसको देख कर पकड़ लिया।

ईवीएम टेम्परिंग के आरोप पर विश्वविद्यालय ने जवाब क्यों नहीं दिया

लेकिन जो मुख्य बात है, जिसपर हम आना चाहेंगे, हमने देखा है कि कल चुनाव आयोग, (मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय) ने कल एक चिठ्ठी निकाली है, आप सबके पास होगी, आप सबने ये सोशल मीडिया में देखी होगी। इस चिठ्ठी में उन्होंने कहा है कि चुनाव आयोग ने कोई ईवीएम मशीन सप्लाई नहीं कि है, दिल्ली विश्वविद्यालय में। हमने तो ये कहा भी नहीं कि चुनाव आयोग इसे सप्लाई करता है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि चुनाव आयोग ने ये चिठ्ठी निकाल दी कि हमने सप्लाई नहीं की, दिल्ली विश्वविद्यालय ने क्यों नहीं चिठ्ठी निकाली कि उन्होंने कहाँ से ली। चुनाव आयोग की तो बात ही नहीं थी। हम तो ये कह रहे हैं कि ईवीएम जो दिल्ली विश्वविद्यालय इस्तेमाल कर रहा है, उसके अंदर गड़बड़ कर दी गई है। उसके अंदर जानबूझ कर टेंम्परिंग की गई है, तो इसका जवाब दिल्ली विश्वविद्यालय को देना चाहिए था या चुनाव आयोग को?

विश्विद्यालय को उसी कंपनी ने ईवीएम सप्लाई किया है जो चुनाव आयोग को करती है

दिल्ली विश्वविद्यालय ने जवाब क्यों नहीं दिया है, बड़ा सीधा-सीधा एक पेज बाँट रहे हैं। ये 10 सितंबर का सर्कुलर है, दिल्ली विश्वविद्यालय का और ये 10 सितंबर का सर्कुलर इन्होंने हर प्रिसिंपल, हैड़, डीन, इलेक्शन ऑफिसर को लिखा है और उसके अंदर इन्होंने ईवीएम के बारे में कहा है। चुनाव आयोग से दो दिन पहले की ये बात है। उन्होंने उनको कहा है कि चुनाव दिवस पर ईवीएम के प्रभावी और निर्दोष उपयोग करने के लिए, कुछ लोगों को मास्टर ट्रेनर्स के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है। इन मास्टर ट्रेनर्स के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) के कुछ अधिकारियों ने ईवीएम की सुचारु कार्य सुनिश्चित की है।

अब ये ईसीआईएल क्या है, ईसीआईएल कंपनी है, जिससे कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने मशीन खरीदी हैं। ईसीआईएल कंपनी है जो चुनाव आयोग को ईवीएम सप्लाई करता है और ये चुनाव आयोग की वेबसाईंट का स्नेप शॉट देंगे। जिसमें नीचे लिखा है, ईवीएम किसने डिजाइन किया है? ईवीएम को दो सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों जैसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बैंगलोर और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद के सहयोग से चुनाव आयोग की तकनीकी विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार और डिजाइन किया गया है। ईवीएम का उपरोक्त दो उपक्रमों द्वारा निर्मित किया जाता है।

नियम के मुताबिक यह कंपनी चुनाव आयोग के अलावे किसी को भी ईवीएम सप्लाई नहीं कर सकती है

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ही सर्विस करती है चुनाव आयोग की ईवीएम को और दिल्ली विश्वविद्यालय की मशीन को सर्विस करती है और दूसरी जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात है कि ईसीआईएल बगैर चुनाव आयोग की अनुमति के किसी को भी ईवीएम नहीं दे सकता है। हमारा सीधा – सीधा प्रश्न दिल्ली विश्वविद्यालय और ईसीआईएल से है कि जब ये डिजाईन तकनीकी विशेषज्ञ समिति ने भारत के निर्वाचन आयोग के लिए किया तो फिर उनकी परमिशन के बगैर कैसे दिल्ली विश्वविद्यालय को दे दिया और अगर इजाजत मिली तो उसकी जानकारी फिर क्यों लोगों से छुपाई जा रही है?

यदि मशीनें चुनाव आयोग ने दी है तो वो अपना पल्ला कैसे झाड़ सकता है ?

अब सच्चाई ये है कि जो भारत के ईवीएम चुनाव आयोग को सप्लाई करते हैं, ईवीएम दिल्ली विश्वविद्यालय को सप्लाई करते हैं, जो मेंटेनेंस का स्टॉफ चुनाव आयोग की ईवीएम का है, मेंटेनेंस का स्टॉफ दिल्ली विश्वविद्यालय का है और दिल्ली विश्वविद्यालय को ईवीएम की परमिशन भारत के निर्वाचन आयोग ने दी है तो निर्वाचन आयोग की परमिशन से दिल्ली विश्वविद्यालय को ये मशीन भारत के निर्वाचन आयोग ने दी है, तो चुनाव आयोग कैसे अपना पलड़ा झाड़ सकता है?

इस घटना से साबित होता है कि ईवीएम टेंपरिंग हो सकती है

हमारा यही तो आरोप है। हम यही तो कहते हैं कि ये ईवीएम को टेंपर किया जाता है और जब ईवीएम को टेंपर दिल्ली विश्वविद्यालय के अंदर किया जाएगा और जब कंपनी इसको बना रही है जो चुनाव आयोग की ईवीएम को बना रही है तो उसके बाद इसकी विश्वसनीयता कैसे है? इसकी विश्वसनियता के ऊपर प्रश्न चिन्ह क्यों नहीं लगेगा? जब जो सेक्रेटरी पोस्ट के ऊपर हमारा कैंडिडेट 6,000 वोट से जीता है, उसको ईवीएम के अंदर जीरों दिखा रहे हैं और 10 नंबर बैलेट के अंदर 40 वोट दिखा रहे हैं। शाम तक के ईवीएम ठीक चलते रहे और उसके बाद के ईवीएम ने मॉल फंक्शनिंग करनी शुरू कर दी, जब अगले दिन काउंटिंग के अंदर आई और तीन-तीन बार काउंटिंग को रोकना पड़ा, तो ये जब स्थिति है तो ईवीएम के ऊपर अब क्या चुनाव आगे होने चाहिएं?

एनएसयूसी ने पारदर्शिता की कमी, जो हमारे दिल्ली विश्वविद्यालय में काउंटिग के लिए है, पिछले साल भी इसको बोला क्योंकि पिछले साल भी इसी तरह से हमारा जो ज्वाइंट सेक्रेटरी कैंडिडेट था, वो ज्वाइंट सेक्रेट्ररी इसी तरह से जीतता हुआ, उन्होंने हरा दिया था और फिर हम सिर्फ प्रेजिडेंट ऑफ सेक्रेटरी पर पिछले साल जीते थे। यही और यही लैक ऑफ ट्रांसपेरेंसी ईवीएम की काउंटिग के अंदर रहता है। तो पिछले दो वर्षों से एनएसयूसी दिल्ली विश्वविद्यालय को लिख रही है कि इसके अंदर वीवीपैट का इस्तेमाल होना चाहिए, 25 प्रतिशत। लेकिन उन्होंने नहीं किया और कंपनी जो चुनाव आयोग को सप्लाई करती है, उसी कंपनी के ईवीएम से किया और टेंपर किया, जो हमारे सामने बड़ा साफ है। तो रुचि गुप्ता जी काउंटिंग के अंदर कैसी-कैसी गड़बड़िया हुई हैं, इसके बारे में संक्षिप्त में बताएंगी। लेकिन एक और राजनीतिक बात मैं कहना चाहूँगा।

 

ईवीएम गड़बड़ी के कई मामले सामने आए

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव की गिनती के दौरान, ईवीएम ग्लिच के कई उदाहरण प्रकाश में आए। एक चौंकाने वाली घटना में, यह नोट किया गया था कि गैर- मौजूदा उम्मीदवारों को वोट स्थानांतरित किए जा रहे थे: मतदाता संख्या 9 के रूप में नोटा के साथ केवल 8 उम्मीदवारों के साथ एक पद पर 40 मतपत्र मतपत्र संख्या 10 पर दिखाए जा रहे थे। इसके अलावा एनएसयूआई उम्मीदवारों को 0 मिल रहे थे वोट। ईसीआई ने डीयू में इस्तेमाल किए गए ईवीएम को ईसीआई या दिल्ली सीईओ (संलग्न) द्वारा आपूर्ति नहीं कि गई बयान देकर खुद को दूर करने की कोशिश की है। हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा पत्र से पता चलता है कि ईसीएम की खरीद ईसीआईएल (संलग्न) द्वारा की जाती है। ईसीआईएल ने डीयू में मतदान से एक दिन पहले 11 सितंबर को भी प्रशिक्षण दिया था। यह ईसीआईएल है जो ईसीआई (संलग्न) को ईवीएम भी प्रदान करता है। इससे ईसीआई ईवीएम पर भी गंभीर संदेह बढ़ता है, एनएसयूआई वोट भी 6 साल में सबसे ज्यादा शेयर करता है; विसंगतियों द्वारा मारा गया गिनती। एनएसयूआई पेपर मतपत्र पर डीयू में रिपोल की मांग करते है

एनएसयूआई  स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में सभी 4 सीटों पर विजयी होगा

एनएसयूआई ने पिछले 2 वर्षों में चुनाव प्रक्रिया में दो बार सुधार की मांग की है जिसमें वीवीपीएटी और ईवीएम- वार वोटों से लैस ईवीएम का उपयोग शामिल है। हालांकि इन मांगों को हर साल डीयू ईसी द्वारा खारिज कर दिया गया है, जिसने पूरे चुनाव प्रक्रिया की अखण्डता को कमजोर कर दिया है। हमें विश्वास है कि एनएसयूआई एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में सभी 4 सीटों पर विजयी होगा

हम पेपर मतपत्र के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में रिपोल की मांग करते हैं

काउंटिंग में मौजूद पिछले साल के डूसू उपाध्यक्ष श्री कुणाल सहरावत ने पत्रकारो को संबोधित करते हुए कहा कि- दिल्ली विश्वविद्यालय के अंदर काउंटिंग की जगह मैं मौजूद था, वहाँ पर देखा गया था कि जब शुरू में काउंटिंग शुरू हुई तो उसी दौरान मशीन के अंदर डिस्प्ले चली जाती है। उनसे जब पूछा जाता है तो उन्होंने कहा कि बैंक साईड से मशीन लेकर आएंगी, हमने कहा कि नहीं फ्रंट साईड से मशीन आएगी, बैंक साईड से नहीं, अगर आप डिस्प्ले को बदलना चाहते हैं। उसके एक घँटे बाद फिर वो दोबारा काउंटिंग शुरू करते हैं,

जब तमाम आगे से, स्टूडेंट का दबाव आता है, उनसे पूछा जाता है तो वो बड़ी दबाव के चक्कर में कहते हैं कि इस साल दिल्ली विश्वविद्यालय में चुनाव आयोग की तरफ से अलोट की गई हैं, तो वो घबरा जाते हैं। उसके कुछ एक घंटे बाद हम देखते हैं कि काउंटिंग के अंदर सेक्रेटरी पोस्ट पर, जैसा कि अभी बताया गया कि कुल स्टूडेंट उसके अंदर 10 दिखाए गए, जबकि हमारे सेक्रेटरी पोस्ट पर 9 थे, नोटा के साथ। तो जब हमने उसके बारे में उनसे पूछा तो उन्होंने कहा छोड़ो, इसको साईड पर रख देते हैं, हम आगे चलते हैं। अगर 500 से कम वोट सेक्रेटरी पोस्ट पर पड़ते हैं तो चुनाव दोबारा करवाएंगे। उनके पास कोई जवाब नहीं होता, सेक्रेटरी पोस्ट का, उस मशीन के लिए कोई जवाब नहीं था।

जब पूछा कि किस कॉलेज की मशीन है, तो उन्होंने बताया ही नहीं कि किस कॉलेज की है। तो साफ- साफ ये दिखाई दे रहा है कि क्या उनके मन में था, किस तरह से 2019 के चुनाव को देखते हुए, वो हमें हराना चाहते थे। उसके साथ जब दूसरा राउंड शुरू होता है, उसमें मैं पूछता हूँ कि जो मशीन सामने रखी हैं, वो कुल कितनी हैं, वो हमें काउंट करने से मना करते हैं। मैं कैसे उसको काउंट करता और उसके अंदर अभी भी 70 के भर मशीन सामने रखी थीं। जो पहला राउंड हुआ था, उसके अंदर 48 मशीन थी, इसका मतलब 120 कुल मशीनें हमने काउंट की। तो कुल 126 मशीन होनी चाहिएं, आपके पास 119  हैं, 7 कहाँ हैं? तो उन्होंने कहा कि सारी मशीनें काउंट कर ली गई हैं, आपको गलत जानकारी हैं, कि 126 मशीनें काउंट की। तो ये सारी बातें पूछी गई थी। इसके साथ जो सारे कंटेंस्टेट थे, जो अलग- अलग पोस्ट पर थे, ऐसा नहीं कि सभी NSUI के थे।

तो उनसे ये सब पूछा तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। हमने चुनाव आयोग से पूछा तो आपकी टीम थी, जिन्होंने सारे पेज पर साईन किए हैं, तो वो कहते हैं कि आप रेलेवेंट कमेटी से पूछो, हमारे पास इसकी अथोर्टी नहीं है कि आपको बताया जाए। तो ये साफ –साफ है कि एक तरह से सारी चीजों को एक साईड रखा गया, सेक्रेटरी पोस्ट पर भी वो घबराए हुए थे और प्रेजिडेंट पोस्ट पर भी। हम लोग सभी पोस्ट पर लीड कर रहे थे, तो उन्होंने साफ शब्द में मना कर दिया कि हम कुछ नहीं बताएंगे, कुल हमने 126 मशीनें काउंट की या नहीं। हम एक ही चीज कहना चाहते हैं कि क्यों हमें कल नहीं बताई गई सारी बातें? हमने वीडियो भी कल पोस्ट की है, जिसके अंदर कम से कम जवाब पूछते हैं तो चुनाव ऑफिसर साफ मना कर देता है और वो घुमाता है सारी चीजों को कि उनके पास अथोर्टी नहीं है।

श्री फिरोज खान ने पत्रकारो को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले साल चुनाव से पहले हमने प्रेस वार्ता की प्रिंसिपल और जो कुछ लोग थे, सालों- साल जिनके साथ मैंने काम किया, तो उन्होंने कहा कि कुछ गड़बड़ होने वाली है। तो प्रेस वार्ता का मेमोरेंडम मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय को दिया कि आप ट्रांसपेरेंसी लाईए, आप वीवीपैट इस्तेमाल कीजिए, सीसीटीवी कैमरा देखिए। जब हमने पिछले साल कहा कि हमें वीडियो दिखा दीजिए, जहाँ आपने काउंटिंग की है, पर इन्होंने हमें जो दिखाया, उसमें कुछ दिख नहीं रहा था।

तो हमने कहा कि ये मशीन के ऊपर आपका कैमरा फोकस होना चाहिए, उन्होंने कहा कि इधर- उधर कैमरा हो गया था। जब निखिल यादव लड़े थे, अभी भी कोर्ट में केस है हमारा। उसके बाद पिछले साल की बात कहेंगे, हमने पहले प्रेस वार्ता की, जब लंच हुआ, रिजल्ट पूरी मीडिया ने दिखाया, हमने भी बाहर सेलिब्रेशन कर दिया कि तीन जीत गए हैं। तो लंच हुआ, लंच के दो घंटे बाद में कहा, कि ज्वाइंट सेक्रेटरी हार गए हैं, हर पोस्ट पर 7,000 वोट थे, ज्वाइंट सेक्रेटरी पर 2,000 वोट थे। हम वहाँ गए, पूरी लड़ाई लड़ी।

उन्होंने कहा कि आप रेलेवेंस कमेटी में दीजिए, हम इसको देखेंगे। हम रेलेवेंस कमेटी के पास गए, खुल्लम खुल्ला मीडिया के सामने उन्होंने हमें सबके सामने हरा दिया। इस साल भी हमें लगा था कि ये ऐसा करेंगे, हमने प्रेस वार्ता की, ये हमारे पास मेमोरेंडम है, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में हमने सब्मिट किया कि आप इसमें वीवीपैट का इस्तेमाल कीजिए, आप इसमें कम से कम ट्रांसपेरेंसी लाईए, हर मशीन जहाँ पर इस्तेमाल होती है, सीसीटीवी कैमरा लगाईए। पर आपने खुद कल देखा कि आपके सामने क्या किया और जबरदस्ती उनको जिता दिया गया।

एक प्रश्न पर कि आपकी मांग क्या है, श्री माकन ने कहा कि हमारी मांग ये है कि पेपर बैलेट के ऊपर दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव दोबारा करवाएं जाएं और आगे के लिए भी सारे चुनाव दिल्ली विश्वविद्यालय के पेपर बैलेट पर होने चाहिएँ और सीसीटीवी कैमरा पूरी की पूरी रिकोर्डिंग होनी चाहिए। हम लोग लीगली भी एग्जामिन कर रहे हैं कि इसको लेकर हम कोर्ट भी जा सकते हैं, लीगली इसको देख रहे हैं। मुख्य मांग हमारी ये है कि पेपर बैलेट पर दोबारा से चुनाव होने चाहिएं, ताकि दूध का दूध पानी का पानी हो, कैमरा लगे होने चाहिए, पूरी रिकोर्डिंग होनी चाहिए।

कोर्ट जाने की कर रहे हैं तैयारी

एक अन्य प्रश्न पर कि क्या आप कोर्ट जाएँगे, इसके लिए, श्री माकन ने कहा कि हम लोग सिर्फ रिजल्ट नहीं पूरा प्रोसिजर ईवीएम की मॉलफंक्शनिंग और ईवीएम में टेंपरिंग जिस तरह से की गई है, उसको हम लीगली एग्जामिन कर रहे हैं, ताकि हम कोर्ट में जाएं और साथ- साथ में ये चुनाव बैलेट पेपर  पर हों और आगे के भी सारे चुनाव पेपर बैलेट पर हों और कैमरा के अंतर्गत हों। इसको लेकर हम कोर्ट में जाएँगे और दिल्ली विश्वविद्यालय में हमारे एनएसयूसी के लोग इस पर दबाव डालेंगे।

एक अन्य प्रश्न पर कि क्या ईसीआईएल इस बात को मान रहा है कि उन्होंने गड़बड़ी की है, श्री माकन ने कहा कि ईसीआईएल के पास कोई और रास्ता नहीं क्योंकि हमें मालूम है कि हम सवाल नहीं कर रहे हैं। हम कह रहे हैं और रिकोर्ड है ये मशीनें ईसीआईएल की हैं और दूसरा ये दिल्ली विश्वविद्यालय का पत्र आपको पढ़कर सुनाया है जिसमें लिखा है कि ईसीआईएल के जो टेक्नीशियन हैं, इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के कुछ अधिकारी (ईसीआईएल) ईवीएम की अच्छी कामकाज सुनिश्चित करें.

तो जब ईसीआईएल के अधिकारी वहाँ पर स्मूथ फंक्शन के लिए बुलाए जा रहे हैं तो इसके अलावा कोई और है ही नहीं। हम आपको पूरी जानकारी दे रहे हैं और पूरी जिम्मेदारी से बोल रहे हैं कि ये मशीनें ईसीआईएल ने दी हैं और इसकी परमिशन चुनाव आयोग ने दी है। इन दोनों चीजों के बारे में मैं अपनी जिम्मेदारी के साथ बोल रहा हूँ। पहला कि दिल्ली विश्वविद्यालय को ये मशीनें ईसीआईएल ने दी हैं और इसकी इजाजत चुनाव आयोग ने दी है।

पेपर बैलेट से ही चुनाव होने चाहिए

एक अन्य प्रश्न पर कि 4- 5 राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, क्या ईवीएम का प्रयोग सही है, श्री माकन ने कहा कि यही हमारा कहना है कि जब एक दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव में ईसीआईएल के सप्लाई किए गए ईवीएम को टेंपर इतनी आसानी से किया जा सकता है तो, और राज्यों के चुनाव में और पार्लियामेंट के चुनाव में जो ईसीआईएल की मशीन हैं, उनको जब इस्तेमाल किया जाएगा तो क्या गारंटी है कि उसकी टेंपरिंग नहीं होगी। इसलिए कांग्रेस पार्टी की जो मांग है,उसको हम दोहराना चाहते हैं कि पेपर बैलेट से ही चुनाव होने चाहिएं, ताकि इस प्रकार से ईवीएम की टेंपरिंग ना हो सके। ये सिर्फ दिल्ली विश्वविद्यालय का मामला नहीं है, ये एक छोटी सी झांकी है कि एक दिल्ली विश्वविद्यालय के अंदर जो नेशनल लेवल की पार्टी इस लेवल पर जाकर ईवीएम में टेंपरिंग हो सकती है जिसको सब लोगों ने खुली आँख से देखा है तो 5 राज्यों के चुनावों में और पार्लियामेंट के चुनाव के अंदर ईवीएम का दुरुपयोग क्यों नहीं होगा?

आंदोलन की कर रहे हैं तैयारी

एक अन्य प्रश्न पर श्री माकन ने कहा कि मैं आपको कह रहा हूँ कि आंदोलन करना होगा, कैसे करना हो, वो हम लोग समय पर निर्णय करेंगे। हमारे प्रस्ताव में है कि चुनाव बैलेट पेपर से होने चाहिएं, ये हमारे अधिवेशन का रेज्यूलेशन का हिस्सा है। आज हम यहाँ पर दोहरा रहे हैं और ये सिर्फ दिल्ली विश्वविद्यालय में नहीं, इसकी झांकी दिखाकर हम कह रहे हैं कि ईवीएम का दुरुपयोग कैसे हो सकता है? इसलिए हम जोर देकर कहना चाहते हैं कि पेपर बैलेट पर ही चुनाव होने चाहिए, कोई आरोप ना लगे, चाहे वो 5 राज्यो के चुनाव हो, चाहे जनरल चुनाव हों या चाहे दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव हों। यही हमारी मांग है और अधिवेशन का रेज्यूलेशन भी था।


 

 

संवाद सूत्र: रिजवान रजा ,नई दिल्ली

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Last updated: सितम्बर 16th, 2018 by Central Desk - Monday Morning News Network

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