ममता बनर्जी को याद आए अटल बिहारी वाजपेयी

आज भारत के 10वें प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म दिन है।  अपने चीर परिचित अंदाज में आज ममता बनजी ने उन्हें श्रद्धांजलि  अर्पित करते हुये एक तस्वीर भी जारी की है। ममता बनर्जी के आधिकारिक फेसबुक अकाउंट पर लगभग सभी महापुरुषों एवं त्योहारों की शुभकामनायें मिल जाएंगी । इस मामले में वो काफी सक्रिय हैं। लेकिन खास बात यह है कि एक विरोधी पार्टी के आदर्श पुरुष का जन्म दिन पर बधाई देना उनकी नैतिक ऊंचाइयों को दर्शाता है। वह भी तब, जब भाजपा प0 बंगाल में एक नयी ताकत बन कर उभर रही है।

अजात शत्रु थे वाजपेयी

पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में वो उनकी सहयोगी पार्टी तथा कैबिनेट में  मंत्री  भी रह चुकी हैं। अटल बिहारी वाजपेयी से उनके संबंध काफी अच्छे थे। वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी अजात शत्रु व्यक्तित्व के स्वामी हैं और उनके विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते हैं। भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी को दो सीटों से दिल्ली कि सत्ता तक पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका रही है । विरोधी कभी भी अटल बिहारी वाजपेयी की खामियाँ नहीं ढूंढ पाये इसलिए वे उन्हें भाजपा का मुखौटा कहते थे। अपने व्यक्तित्व के दम पर ही उन्होने उस विषम राजनीतिक परिस्थिति में गठबंधन की सरकार बनाई और कई धुरंधर विरोधियों को भी एक मंच पर लाने में कामयाब  रहे ।

13 दिन , 13 महीने फिर पाँच साल

अटल बिहारी वाजपेयी के 93 वें जन्मदिन पर ममता बनर्जी द्वारा जारी शुभकामना संदेश
अटल बिहारी वाजपेयी के 93 वें जन्मदिन पर ममता बनर्जी द्वारा जारी शुभकामना संदेश

वे राम मंदिर आंदोलन से उपजे नेता थे जिन्हें जनता के बीच बहुत लोकप्रियता मिली। वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी । तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें सरकार बनाने का न्योता दिया। उन्होने सरकार बनाई और वे भारत के 10वें प्रधान मंत्री के रूप में चुने गए पर वे सदन में  बहुमत सिद्ध नहीं कर पाये और मात्र 13 दिन में ही उनकी सरकार गिर गयी। उसके दो अल्पकालिक प्रधानमंत्री के कार्यकाल के बाद आखिरकार लोक सभा को भंग कर दिया गया एवं वर्ष 1998 के लोक सभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी । इस बार वे 13 महीने तक ही सरकार चला पाये ।  एआईडीएमके प्रमुख जयललिता द्वारा समर्थन वापस ले लेने के कारण उनकी सरकार गिर  गयी। वर्ष 1999 में दुबारा लोक सभा चुनाव हुये इस बार उनका गठबंधन पूर्ण बहुमत के साथ उभर कर आया और उन्होने पूरे  पाँच वर्ष सरकार चलायी।

कई ऐतिहासिक घटनाओं के लिए याद किया जाता है उनका कार्यकाल

उनके कार्यकाल में  कई ऐतिहासिक घटनाएं भी हुयी जिसमें कारगिल युद्ध , लाहौर समझौता , कांधार विमान  अपहरण , संसद हमला,  जैसी बड़ी घटनाएँ हुयी लेकिन उनका कार्यकाल दो कारणों से सबसे अधिक चर्चा में रहा ।  एक वर्ष   वर्ष 1998 का पोखरण परमाणु परीक्षण  दूसरा 2002 का गुजरात दंगा ।
उनके द्वारा शुरू की गयी प्रधानमंत्री स्वर्णिम चतुर्भुज योजना भारत के विकास के लिए मील का पत्थर साबित हुयी। उनके ही कार्यकाल में भारत विश्व व्यापार संगठन ( डबल्यूटीओ ) में शामिल हो गया इससे भारत के द्वारा विदेशी पूंजी निवेशकों के लिए पूरी तरह से खोल दिये गए। उनके कार्यकाल में देश के सकल घरेलू उत्पाद में काफी वृद्धि दर्ज की गयी और सेंसेक्स ने अपने इतिहास में पहली बार 6000 का आंकड़ा छुआ । देश में सूचना क्रांति युग की शुरुआत उनके ही कार्यकाल से शुरू हुयी।

हार, सन्यास फिर रुग्णावस्था

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में मिली हार की नैतिक ज़िम्मेदारी उन्होने अपने ऊपर ली और बाद में उन्होने भाजपा की कमान लाल कृष्ण आडवाणी को सौंप दी। वर्ष 2009 के चुनाव से पहले ही उन्होने राजनीतिक सन्यास लेने की भी घोषणा कर दी। पार्टी के अंदर चल रहे कुछ गतिविधियों से शायद वे नाराज चल रहे थे। तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी से उनकी संवादहीनता कई बार मुखर होकर सामने आई थी और बाद में जाहिर होती रही। हालांकि उनके सन्यास को भाजपा ने उनके स्वास्थ्य से ही जोड़कर प्रचारित किया। उसी वर्ष उन्हें स्ट्रोक भी हुआ था जिसमें उनकी बोलने की क्षमता जाती रही जो फिर ठीक नहीं हुयी। अभी भी अत्यंत रुग्णावस्था में अपने जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिन रहे हैं। उन्होने एक बच्ची को भी गोद लिया था ।

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Last updated: दिसम्बर 25th, 2017 by Pankaj Chandravancee

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